

Gadchiroli Industrial Takeoff: महाराष्ट्र का गड़चिरोली जिला, जो कभी घने जंगलों, पिछड़ेपन और हिंसक नक्सली गतिविधियों के लिए जाना जाता था, आज देश के सबसे बड़े औद्योगिक और सामाजिक परिवर्तन की नई मिसाल पेश कर रहा है।
सुरजागढ़ पहाड़ियों में स्थित समृद्ध लौह अयस्क (Iron Ore) के खजाने और भारी औद्योगिक निवेश की बदौलत गड़चिरोली अब देश के नक्शे पर महाराष्ट्र के 'जमशेदपुर' के रूप में उभर रहा है।
सुरजागढ़ की खदानों में उपलब्ध लौह अयस्क की गुणवत्ता वैश्विक स्तर की है। यहां 63% से 65% तक उच्च ग्रेड का प्राकृतिक आयरन ओर मौजूद है, जो चीन के भंडार से भी बेहतर और ओडिशा के खनिजों के समकक्ष है।
लॉयड्स मेटल्स एंड एनर्जी लिमिटेड (LMEL) द्वारा किए गए शुरुआती निवेश के बाद अब स्वीडिश कंपनियों और अन्य औद्योगिक समूहों के साथ MoU के जरिए इस क्षेत्र में ₹4 लाख से ₹5 लाख करोड़ के बड़े निवेश की राह खुली है। आने वाले समय में यहां 13 से 14 नए औद्योगिक प्लांट स्थापित होने की उम्मीद है, जिससे यह विदर्भ ही नहीं बल्कि देश का दूसरा सबसे बड़ा स्टील हब बनने जा रहा है।
इस औद्योगिक परिवर्तन का सबसे बड़ा मानवीय और सामाजिक पहलू यह है कि जो युवा कभी भटककर नक्सली आंदोलन में शामिल हो गए थे, उनमें से लगभग 200 पूर्व नक्सलियों को इन खदानों और प्लांट्स में स्थायी रोजगार दिया गया है। बंदूक की जगह अब उनके हाथों में रोजगार और विकास की चाबी है, जिससे क्षेत्र में हिंसा का प्रभाव तेजी से खत्म हो रहा है।
गड़चिरोली की स्थानीय आदिवासी महिलाएं, जिन्हें पहले साइकिल चलाना भी नहीं आता था, आज आधुनिक सिमुलेटर्स पर डेढ़ महीने की कड़ी ट्रेनिंग लेकर 70 से 100टन क्षमता वाले विशालकाय हेवी डंप ट्रिक्स, व्हील लोडर और ट्रेलर्स बेझिझक चला रही हैं। झारखंड में व्यावहारिक प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद ये महिलाएं 200 से 300 किलोमीटर तक भारी वाहनों को चलाकर अपने परिवार और पूरे समाज को नई दिशा दे रही हैं।
औद्योगिक विकास ने यहां के आदिवासियों और स्थानीय लोगों का जीवन स्तर पूरी तरह बदल दिया है।
स्थानीय भागीदारी: परियोजनाओं में कार्यरत कुल श्रमशक्ति में से 85% लोग महाराष्ट्र के हैं, जिनमें अकेले 65% स्थानीय गढ़चिरौली जिले के निवासी हैं।
आमदनी में भारी उछाल: जहां पहले स्थानीय परिवारों की मासिक आय मुश्किल से ₹5,000 थी, वहीं आज न्यूनतम मासिक वेतन ₹20,000 से ₹25,000 तक पहुंच गया है।
बाजार की रंगत बदली: पहले जहां पूरे क्षेत्र में साल भर में महज 5060 दोपहिया वाहन बिकते थे, आज केवल एक महीने में 200 से 300 टूव्हीलर्स की बिक्री हो रही है।
जंगल और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बिना खनन करने के लिए यहां 'ग्रीन माइंडसेट' अपनाया गया है।
खदान से कंसारी प्लांट तक 300- 400 ट्रकों के परिवहन और कार्बन उत्सर्जन को समाप्त करने के लिए 87 किलोमीटर लंबी भूमिगत स्लरी पाइपलाइन बिछाई गई है। इसके जरिए लौह अयस्क का पाउडर पानी में घोलकर सीधे पंसारी भेजा जाता है, जहां से पानी अलग कर पैलेट और स्पंज आयरन तैयार किया जाता है।
खदानों में डीजल ट्रकों की जगह 56 बैटरीचालित (EV) डंप ट्रक और सौर ऊर्जा (रिन्यूएबल एनर्जी) का व्यापक इस्तेमाल किया जा रहा है।
कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) के तहत यहां शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में क्रांति आई है-
सीबीएसई स्कूल व अस्पताल: स्थानीय बच्चों के लिए 100% नि:शुल्क प्रवेश वाला सीबीएसई स्कूल और अंधविश्वास को दूर कर आधुनिक चिकित्सा देने वाला 150बेड का आधुनिक अस्पताल शुरू किया गया है।
गारमेंट यूनिट: स्थानीय महिलाओं के लिए गारमेंट यूनिट स्थापित की गई है, जहां 450 से अधिक आदिवासी महिलाएं कंपनी और स्कूलों के यूनिफॉर्म तैयार कर आत्मनिर्भर बन रही हैं।
कभी नक्सलवाद के साये में सिसकने वाला गड़चिरोली जिला आज अपनी प्राकृतिक संपदा, तकनीक और स्थानीय श्रमबल के बल पर भारत के औद्योगिक पुनर्जागरण की नई गाथा लिख रहा है।