बायोमाइनिंग प्रोजेक्ट में 67 करोड़ का घोटाला? भाजपा नगरसेवक राज गौरव वानखेड़े ने प्रशासन और एजेंसी को घेरा

छत्रपति संभाजीनगर मनपा की स्थायी समिति बैठक में Biomining Project Corruption के आरोप लगे हैं। भाजपा नगरसेवक राज वानखेड़े के कड़े विरोध के बाद सभापति ने 17 करोड़ के भुगतान पर रोक लगा दी है।
₹67 Crore Scam in Biomining Project? BJP Corporator Raj Gaurav Wankhede Corners Administration and Agency
नगर सेवक राज वानखेडे (सोर्स: फाइल फोटो)
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Biomining Project Corruption: महानगरपालिका के 67 करोड़ रुपये के महत्वाकांक्षी बायोमाइनिंग प्रोजेक्ट में बड़े पैमाने पर अनियमितता और भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं। सोमवार को स्थायी समिति की बैठक में भाजपा नगरसेवक राज गौरव वानखेड़े ने इस मुद्दे को उठाते हुए प्रशासन और ठेकेदार एजेंसी 'जीएनआई' पर गंभीर आरोप लगाए। हंगामे को देखते हुए स्थायी समिति के सभापति अनिल मकरिये ने संबंधित एजेंसी के 17 करोड़ रुपये के भुगतान पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है।

काम अधूरा, पर बिल पूरा

नगरसेवक राज वानखेड़े ने बैठक में सनसनीखेज दावा किया कि एजेंसी ने तय मानकों के अनुसार काम नहीं किया है, फिर भी 17 करोड़ रुपये का बिल भुगतान के लिए तैयार कर लिया गया। उन्होंने आरोप लगाया कि, शुरुआत में बिना मशीनों के ही केवल कचरे को एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाकर 'प्रक्रिया' दिखाई गई। एजेंसी को भुगतान मिलने के बाद ही मशीनें मौके पर लाई गईं। प्रशासनिक कार्यकाल के दौरान सरकारी धन की खुली लूट हुई है और अधिकारी एजेंसी को बचाने में जुटे हैं।

प्रशासन का पक्ष: 8.50 लाख मीट्रिक टन का निस्तारण

विपक्ष के आरोपों का जवाब देते हुए उप आयुक्त (घनकचरा प्रबंधन) नंदकिशोर भोंबे ने बताया कि अब तक लगभग 8.50 लाख मीट्रिक टन कचरे पर प्रक्रिया पूरी की जा चुकी है। उन्होंने स्वीकार किया कि एजेंसी का 17 करोड़ का बिल लंबित है और नारेगांव में अभी भी करीब 6 लाख मीट्रिक टन कचरा शेष है। हालांकि, प्रशासन के इस जवाब से समिति के सदस्य संतुष्ट नहीं हुए।

7 करोड़ का जुर्माना

बैठक में यह मुद्दा भी उठा कि बायोमाइनिंग के दौरान पर्यावरणीय नियमों का उल्लंघन हुआ है, जिसके कारण राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) ने महानगरपालिका पर 7 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया है। सदस्यों ने तीखा सवाल पूछा कि यह जुर्माना भ्रष्टाचार करने वाली एजेंसी भरेगी, लापरवाह अधिकारी या जनता के टैक्स का पैसा? प्रशासन इस सवाल पर चुप्पी साधे रहा।

निगरानी और सीसीटीवी पर उठे सवाल

सदस्यों ने प्रशासन से पूछा कि कचरे के निस्तारण की निगरानी के लिए लगाई गई सीसीटीवी व्यवस्था का डेटा कहाँ है? कचरे का सही माप किस आधार पर किया गया और 'परियोजना प्रबंधन सलाहकार' (PMC) की रिपोर्ट में क्या खामियां हैं? सदस्यों का आरोप था कि कागजों पर काम ज्यादा और जमीन पर कम हुआ है।

सभापति का कड़ा फैसला

बैठक के अंत में बढ़ते विवाद को देखते हुए सभापति अनिल मकरिये ने सख्त रुख अपनाया। उन्होंने निर्देश दिए कि।

  • मामले की एक विस्तृत जांच रिपोर्ट अगली बैठक में पेश की जाए।
  • जब तक रिपोर्ट नहीं आती, एजेंसी को एक रुपये का भी भुगतान न किया जाए।
  • यदि अनियमितता साबित हुई, तो संबंधित अधिकारियों और ठेकेदार पर कठोर कार्रवाई होगी।

क्यों शुरू हुआ था प्रोजेक्ट?

नारेगांव डंपिंग ग्राउंड पर वर्ष 1982 से कचरा जमा हो रहा था। न्यायालय के निर्देश के बाद 12 लाख मीट्रिक टन कचरे के निस्तारण के लिए 67 करोड़ का फंड मंजूर हुआ था। चिकलथाना, पडेगांव और हर्सूल क्षेत्रों को भी इस योजना में शामिल किया गया था, लेकिन अब यह पूरी योजना जांच के दायरे में आ गई है।

– नवभारत लाइव के लिए छत्रपति संभाजीनगर से शफीउल्ला हुसैनी की रिपोर्ट

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