Fodder Crisis Conservation Campaign: राज्य के कुछ क्षेत्रों में वर्षा की कमी और खरीफ फसलों के उत्पादन पर पड़े प्रभाव को देखते हुए आने वाले समय में पशुधन के लिए हरे और सूखे चारे की कमी होने की आशंका है।
संभावित चारा संकट से पहले ही आवश्यक उपाय करने के लिए पशुपालन विभाग ने राज्यभर में ‘चारा जागरूकता एवं संरक्षण अभियान’ चलाने का निर्णय लिया है। अभियान का मुख्य उद्देश्य चारा संकट उत्पन्न होने से पहले उपलब्ध संसाधनों का प्रभावी उपयोग करना है।
इसके अंतर्गत चारा उत्पादन एवं संरक्षण, सुरक्षित भंडारण, फसल अवशेषों का उपयोग, चारे का पोषण मूल्य बढ़ाना तथा पशुपालकों को प्रशिक्षण देने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
फसल कटाई के बाद उपलब्ध कड़बा, भूसा, पुआल और डंठल को जलाने या नष्ट करने के बजाय उनका उपयोग पशुओं के लिए पौष्टिक चारा तैयार करने में किया जाएगा। इसके लिए फसल अवशेषों का संग्रह, सुरक्षित भंडारण, वैज्ञानिक विधि से उपचार और पोषण मूल्यवर्धन की जानकारी दी जाएगी।
गांव स्तर पर फसल अवशेषों को वर्षा से बचाने, उचित नमी बनाए रखने तथा फफूंद से संरक्षण के प्रत्यक्ष प्रशिक्षण दिए जाएंगे। निम्न गुणवत्ता वाले सूखे चारे की उपयोगिता बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक विधियों का प्रदर्शन किया जाएगा।
कड़बा और पुआल पर यूरिया उपचार की विधि भी सिखाई जाएगी। चारे की बर्बादी रोकने के लिए कड़बाकुट्टी यंत्र के उपयोग को बढ़ावा दिया जाएगा।
जिन क्षेत्रों में पर्याप्त मात्रा में हरा चारा उपलब्ध है, वहां अधिक से अधिक मुरघास (साइलेज) तैयार करने के लिए विशेष अभियान चलाया जाएगा। पशु चिकित्सालयों में हाइड्रोपोनिक इकाइयां स्थापित कर कम लागत में हरा चारा तैयार करने का प्रदर्शन किया जाएगा।
पशु चिकित्सा संस्थानों के माध्यम से अजोला की क्यारियां तैयार कर उसके पशु आहार में उपयोग की जानकारी भी दी जाएगी। सिंचाई की सुविधा वाले किसानों को कम अवधि में और कम पानी में तैयार होने वाली चारा फसलों के बीज उपलब्ध कराए जाएंगे।
बांधों और तालाबों का जलस्तर घटने के बाद उपलब्ध गादयुक्त क्षेत्रों में चारा फसलों की बुआई का नियोजन किया जाएगा।
पशु चिकित्सा अधिकारी, सहायक पशुधन विकास अधिकारी और पशुधन पर्यवेक्षक गांव-गांव जाकर पशुपालकों के लिए बैठकें, प्रशिक्षण और प्रत्यक्ष प्रदर्शन आयोजित करेंगे। पत्रिकाओं, सूचना-पत्रों, रेडियो, डिजिटल माध्यमों, व्हॉट्सऐप समूहों और लघु फिल्मों के माध्यम से भी जनजागरण किया जाएगा।
महाराष्ट्र पशु एवं मत्स्य विज्ञान विश्वविद्यालय, नागपुर तथा पशु चिकित्सा महाविद्यालयों के विशेषज्ञों का मार्गदर्शन लिया जाएगा। स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार कम लागत वाली नवीन चारा संरक्षण विधियों को अपनाकर उनका विस्तार किया जाएगा।
गांव स्तर पर पशु चिकित्सा अधिकारी और सहायक पशुधन विकास अधिकारी अभियान के प्रत्यक्ष क्रियान्वयन, पशुपालक प्रशिक्षण और प्रदर्शन की जिम्मेदारी संभालेंगे। तालुका स्तर पर तालुका पशुपालन अधिकारी सभी संस्थाओं के माध्यम से होने वाले कार्यों की नियमित समीक्षा करेंगे।
जिला स्तर पर जिला पशुपालन उपआयुक्त पुणे जिले की कार्ययोजना तैयार कर उसके क्रियान्वयन की प्रत्यक्ष जांच करेंगे। विभागीय और राज्य स्तर पर प्रादेशिक सहआयुक्त तथा सहसंचालक (पशु आहार) अभियान की प्रगति की समीक्षा कर आवश्यक दिशा-निर्देश जारी करेंगे। अभियान पर होने वाला खर्च विभाग को उपलब्ध निधि से किया जाएगा।
पशुपालन आयुक्तालय के आयुक्त डॉ. किरण पाटील ने कहा है कि पशु चिकित्सा अधिकारी, सहायक पशुधन विकास अधिकारी और पशुधन पर्यवेक्षक गांव-गांव जाकर पशुपालकों को प्रत्यक्ष प्रदर्शन और प्रशिक्षण देंगे। संकट उत्पन्न होने के बाद उपाय खोजने के बजाय संकट से पहले ही उपलब्ध संसाधनों का प्रभावी उपयोग करना वर्तमान स्थिति में अधिक महत्वपूर्ण है।
- नवभारत लाइव के लिए पुणे से समीर सय्यद की रिपोर्ट