दगडूशेठ गणपति मंदिर में मोरया गोसावी पालकी का स्वागत करते ट्रस्ट पदाधिकारी (सोर्सः सोशल मीडिया)
पुणे

दगडूशेठ मंदिर में गूंजा मोरया गान, मोरया गोसावी पालकी का हुआ भव्य स्वागत

Dagdusheth Ganpati 2026 Ganeshotsav: 134वें गणेशोत्सव में दगडूशेठ हलवाई गणपति और चिंचवड़ देवस्थान की ऐतिहासिक परंपरा फिर हुई जीवंत, जानें पूरी कहानी

वेदांत जोशी

Dagdusheth Halwai Trust Pune: पुणे के श्रीमंत दगडूशेठ हलवाई सार्वजनिक गणपति ट्रस्ट और सुवर्णयुग तरुण मंडल के 134वें गणेशोत्सव के ऐतिहासिक अवसर पर भक्ति और परंपरा का अद्भुत नजारा देखने को मिला। इस मौके पर चिंचवड़ देवस्थान ट्रस्ट की ओर से आई श्री मोरया गोसावी की पवित्र पालकी का वैदिक मंत्रोच्चार, ढोल-ताशों की गूंज और भव्य आतिथ्य के बीच स्वागत किया गया।

महाआरती से हुई शुरुआत

ट्रस्ट के पदाधिकारियों ने पालकी का भव्य स्वागत करते हुए धार्मिक माहौल को और भी दिव्य बना दिया। चिंचवड़ देवस्थान के मुख्य विश्वस्त मंदार महाराज देव ने श्रीमंत दगडूशेठ गणपति की महाआरती उतारकर जन-कल्याण की प्रार्थना की, जिसे देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।

गणमान्य लोगों की रही मौजूदगी

इस अवसर पर चिंचवड़ देवस्थान ट्रस्ट के मंदार महाराज देव, श्रीमंत दगडूशेठ हलवाई गणपति ट्रस्ट के अध्यक्ष सुनील रासने, कोषाध्यक्ष महेश सूर्यवंशी, सह-सचिव अमोल केदारी सहित सुवर्णयुग तरुण मंडल के सौरभ रायकर, मंगेश सूर्यवंशी, विनायक रासने और सचिन आखाडे जैसे पदाधिकारी मौजूद रहे। दोनों धार्मिक संस्थाओं के इस संगम ने श्रद्धालुओं को भावविभोर कर दिया।

सदियों पुरानी है यह परंपरा

कहा जाता है कि श्री मोरया गोसावी महाराज हर भाद्रपद माह की विनायकी चतुर्थी को पैदल चलकर मोरगांव में भगवान मयूरेश्वर के दर्शन करने जाया करते थे। जब वृद्धावस्था के कारण उनके लिए यह यात्रा कठिन हो गई, तो भगवान मयूरेश्वर ने स्वप्न में दर्शन देकर कहा कि अब वे स्वयं उनके पास आएंगे, और इसी वचन से इस पालकी परंपरा का जन्म हुआ।

गणेश कुंड से मिली थी दिव्य प्रतिमा

भगवान के आदेश पर चिंचवड़ के गणेश कुंड से प्रति-मयूरेश्वर स्वरूप की एक दिव्य मूर्ति प्राप्त हुई थी, जिसे श्री मोरया गोसावी ने चिंचवड़ स्थित 'मंगलमूर्ति वाड़ा' में स्थापित किया। तभी से हर साल माघ और भाद्रपद महीने में यह पालकी मोरगांव की यात्रा पर निकलती है।

पुणे से मोरगांव तक की यात्रा

माघ महीने में यह यात्रा रथ से होती है, जबकि भाद्रपद में युवा श्रद्धालु पालकी को कंधों पर उठाकर चिंचवड़ से मोरगांव तक ले जाते हैं। जाते समय सबसे पहले पुणे के 'श्री कसबा गणपति' पालकी का स्वागत करते हैं, वहीं लौटते समय आखिरी पड़ाव दगडूशेठ हलवाई गणपति का मंडप होता है, जहां दोनों ट्रस्ट आपस में एक-दूसरे की आरती उतारते हैं। यह पारस्परिक भक्ति भरा दृश्य पुणेवासियों के लिए एक अलौकिक अनुभव बन जाता है।

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