पुणे के गणेश मंडपों में दिख रहा युवा कलाकारों का हुनर, झांकियों से रंगमंच की पहली सीढ़ी

Pune Ganeshotsav Live Tableaux: पुणे की गणेशोत्सव झांकियां नवोदित कलाकारों के लिए रंगमंच की पहली पाठशाला बन रही हैं। हजारों दर्शकों के सामने अभिनय से युवाओं का आत्मविश्वास बढ़ रहा है।
Pune Ganeshotsav Live Tableaux Become Stage
अभिनय करते कलाकार(फोटो नवभारत)
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Stage For New Artists In Pune: गणेशोत्सव के 10 दिनों में पुणे के विभिन्न गणेश मंडपों में साकार होने वाली जीवंत झांकियां देखने के लिए हर दिन बड़ी संख्या में नागरिक उमड़ते हैं। ऐतिहासिक और पौराणिक प्रसंगों से लेकर सामाजिक विषयों और जनजागरण के संदेशों को जीवंत करने वाली इन झांकियों के पीछे नवोदित कलाकारों की कड़ी मेहनत छिपी होती है।

रंगमंच पर कदम रखने का सपना देखने वाले युवाओं के लिए गणेशोत्सव के ये दस दिन किसी खुले रोज रंगमंच से कम नहीं हैं। बड़े नाट्य मंच या व्यावसायिक रंगभूमि पर अवसर मिलने से पहले उन्हें हजारों दर्शकों के सामने अपनी कला आजमाने का मौका यहीं मिलता है।

अभिनय का प्रशिक्षण ले चुके और केवल अभिनय में रुचि रखने वाले अनेक युवा गणेशोत्सव की जीवंत झांकियों में अलग अलग भूमिकाएं निभा रहे हैं। इस वर्ष भी शहर के कई मंडलों ने ऐतिहासिक और पौराणिक प्रसंगों को झांकियों के माध्यम से मंचित किया है।

रोज मिलता है नया अनोखा अनुभव

जीवंत झांकी में भूमिका निभाना केवल संवाद याद करने तक सीमित नहीं है। कलाकारों को संवाद अदायगी, देहबोली, भाव-भंगिमा, वेशभूषा और रंगभूषा पर लगातार मेहनत करनी पड़ती है। कई युवा दिन में नौकरी या पढ़ाई करते हैं और रात में झांकी की रिहर्सल में शामिल होते हैं, एक ही प्रसंग को दस दिनों तक बार-बार हजारों दर्शकों के सामने प्रस्तुत करने से कलाकारों का आत्मविश्वास बढ़ता है।

हर प्रस्तुति के बाद दर्शकों की प्रतिक्रिया से अपनी कमियां समझने और अगले प्रयोग में उनमें सुधार करने का अवसर भी मिलता है। यही अनुभव उन्हें रंगमंच की बारीकियां सिखाता है। नवोदित कलाकारों के लिए गणेश मंडप अब केवल धार्मिक आयोजन का हिस्सा नहीं, बल्कि अभिनय की पहली पाठशाला भी बन रहा है।

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कलाकारों ने क्या कहा?

पुणे शहर के प्रणव गराडे ने कहा कि जीवंत यांकी में भूमिका निभाते समय सामने बैठे। दर्शकों बढ़ता है। संवाद, देहबोली और भाव-भंगिमा का सही तालमेल बैठाने का प्रयास रहता है। अभिनय की बारीकियां समझ में आती हैं।

कलाकार (अफजलखान वध) पीयूष शिरसागर का कहना है कि ऐतिहासिक प्रसंग साकार करते समय केवल संवाद बोलना पर्याप्त नहीं होता। जिस दौर और व्यक्तिरेखा को निभा रहे हैं, उसे समझकर भूमिका में उतरना पड़ता है। हर प्रयोग के बाद अपनी गलतियां सुधारने का मौका मिलता है। बड़े रंगमंच पर जाने से पहले यह अनुभव हमारे लिए बेहद महत्वपूर्ण है।