सिंहस्थ कुंभ (सोर्स: AI)
नासिक

सिंहस्थ कुंभ का आयोजन 12 साल बाद ही क्यों? समझें अमृत कलश, समुद्र मंथन और गुरु की ज्योतिषीय गणना

Nashik Simhastha Kumbh: नासिक सिंहस्थ कुंभ हर 12 वर्ष में आयोजित होता है। इसके पीछे समुद्र मंथन की पौराणिक कथा और बृहस्पति के सिंह राशि में प्रवेश से जुड़ी धार्मिक-ज्योतिषीय मान्यताएं हैं।

रामबाबू चौबे, आलोक उमाकृष्ण

12 Years Religious Mythological Astrology: नासिक सिंहस्थ कुंभ मेला भारतीय संस्कृति का एक अद्वितीय धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन माना जाता है। यह भारत की सांस्कृतिक धरोहर का महत्वपूर्ण हिस्सा है, जो हर 12 वर्षों में विशेष रूप से चार स्थानों- प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक में आयोजित होता है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार इस आयोजन में पवित्र नदियों में स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह अद्वितीय आयोजन हर 12 साल बाद ही क्यों किया जाता है? दरअसल इस मेले के आयोजन के पीछे गहरी पौराणिक मान्यताएं और परंपराएं जुड़ी हुई हैं।

सबसे बड़ा सांस्कृतिक धरोहर

आइए इसके बारे में विस्तार से जानते हैं, मान्यता है कि कुंभ मेले की उत्पत्ति समुद्र मंथन की प्राचीन कथा से जुड़ी है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, पौराणिक कथाओं के अनुसार, समुद्र मंथन (क्षीरसागर मंथन) ब्रह्मांड के दिव्य क्षीर सागर (दूध के महासागर) में हुआ था, जिसे कई मान्यताओं में आज के हिन्द महासागर या अंतरिक्ष की आकाशगंगा से भी जोड़ा जाता है।

वहीं, पृथ्वी पर इसके भौतिक साक्ष्य के रूप में बिहार के बांका जिले में स्थित मंदार पर्वत को वह स्थान माना जाता है जिसका उपयोग मथनी (चुरने वाली धुरी) के रूप में किया गया था कि देवताओं और असुरों के क्षीरसागर के मंथन के दौरान जब भगवान धन्वंतरि अमृत का कलश लेकर प्रकट हुए, तब उसे पाने के लिए देवता और असुरों में संघर्ष छिड़ गया। अमृत प्राप्त करने के लिए समुद्र मंथन किया था।

12 वर्ष में ही गुरु का होता है सिंह राशि में प्रवेश

नासिक में लगने वाले कुंभ मेले को सिंहस्थ कुंभ मेला (या नासिक-त्र्यंबकेश्वर सिंहस्थ) कहा जाता है। नासिक में लगने वाले कुंभ मेले को क्यों कहा जाता है सिंहस्थ इसके पीछे का कारण यह है कि यह मेला तब आयोजित होता है जब बृहस्पति (गुरु) सिंह राशि (Leo) में और सूर्य मेष राशि में होते हैं।

और यह खगोलीय नक्षत्र की गणना 12 वर्ष में ही आती है इसे सीधे-सीधे शब्दों में कहा जाए तो 12 वर्ष के अंतराल के बाद ही बृहस्पति गुरु सिंह राशि में प्रवेश करता है।

12 दिनों तक चला था देवताओं असुरों के बीच संघर्ष

अमृत कलश को लेकर देवताओं और असुरों के बीच 12 दिव्य दिनों तक संघर्ष चला था। ये 12 दिन पृथ्वी के 12 वर्षों के बराबर माने जाते हैं। कथा के अनुसार, इस दौरान अमृत की कुछ बूंदें 12 स्थानों पर गिरी थीं, जिनमें से चार स्थान पृथ्वी पर स्थित हैं, जो प्रयागराज, हरिद्वार, उज्जैन और नासिक जिला हैं।

यही कारण है कि इन स्थानों पर कुंभ मेला आयोजित किया जाता है। वहीं ज्योतिषीय दृष्टिकोण से देखा जाए तो बृहस्पति ग्रह हर 12 वर्षों में 12 राशियों का चक्र पूरा करता है। ऐसे में कुंभ मेला का आयोजन उस समय होता है, जब बृहस्पति किसी विशेष राशि में स्थित होते हैं।

शाही/अमृत स्नान का महत्व क्या है?

सिंहस्थ कुंभ मेले में पवित्र नदियों में स्नान करना अत्यधिक शुभ माना जाता है। माना जाता है कि इस दौरान नदियों का जल अमृत के समान पवित्र होता है, इसलिए इस दौरान श्रद्धालु दूर-दूर से स्नान करने आते हैं।

वही एक कहावतें भी है कि देशभर के विभिन्न पंथ संप्रदाय के साधु संत ऋषि मुनि साधक नदियों के किनारे एक मां दो माह तक रहकर कठिन तक तपस्या साधना पूजा पाठ हवन यज्ञ करते हैं, जिसके कारण इस दौरान किसी विशेष तिथि पर्व पर सईया अमृत स्नान का विशेष धार्मिक महत्व प्राप्त है। श्रद्धालु यहां स्नान कर अपने पापों से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं

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