Nashik Ahilyadevi Holkar Bridge: नासिक शहर की जीवनदायिनी गोदावरी नदी पर स्थित ऐतिहासिक अहिल्यादेवी होलकर पुल के नीचे लगाए गए नए मैकेनिकल गेट्स विवादों के घेरे में आ गए हैं। लगभग 26 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से तैयार इन गेट्स की बनावट और इस्तेमाल की गई सामग्री को देखकर शहरवासी और विशेषज्ञ प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठा रहे हैं।
स्थानीय नागरिकों और तकनीकी जानकारों का कहना है कि इन गेट्स को देखने पर ऐसा प्रतीत होता है मानो इनके निर्माण के लिए सामग्री किसी भंगार बाजार (स्क्रैप मार्केट) से लाई गई हो।
करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी गेट्स की फिनिशिंग और मजबूती संतोषजनक नहीं लग रही है। सोशल मीडिया और सार्वजनिक चर्चाओं में यह सवाल उठ रहा है कि क्या जनता के टैक्स के पैसे का सही उपयोग हुआ है या यह प्रोजेक्ट भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गया है?
विशेषज्ञों के अनुसार, नदी के खुले पात्र ( (नदी तल) में इस तरह के डिजाइन वाले गेट्स का उपयोग तकनीकी रूप से समझ से परे है। आमतौर पर इस प्रकार के गेट्स बाधों या नहरों के लिए होते हैं।
नदी में पानी का बहाव, गाद और कचरे का दबाव अधिक होता है, जिसके लिए विशेष इंजीनियरिंग की आवश्यकता होती है, विशेषज्ञों का तर्क है कि ऐसे गेट्स नदी के प्राकृतिक प्रवाह को प्रभावित कर सकते हैं और मानसून के दौरान बाढ़ जैसी स्थिति में खतरनाक साबित हो सकते हैं,
करोड़ों रुपये खर्च करने के बाद भी यदि गेट्स का लुक और मजबूती भंगार जैसी है, तो यह गंभीर जांच का विषय है, प्रशासन को जनता के पैसे का हिसाब देना होगा।
-नासिक, जागरूक नागरिक
26 करोड़ रुपये की लागत के बावजूद, प्रोजेक्ट की उपयोगिता और दीर्घकालिक मजबूती पर संशय बना हुआ है। नासिक के जागरूक नागरिकों ने प्रशासन से निम्नलिखित मांगें की हैं- इन गेट्स के निर्माण में इस्तेमाल की गई स्टील और अन्य सामग्री की गुणवता की स्वतंत्र लैब से जांच कराई जाए।
नदी पात्र में इस प्रकार के गेट लगाने के तकनीकी कारणों को सार्वजनिक किया जाए। यदि गुणवत्ता में कमी पाई जाती है, तो संबंधित ठेकेदार और अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाए।
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अहिल्यादेवी होलकर पुल नासिक की पहचान है। इसके संरक्षण के नाम पर किया गया यह "मैकेनिकल प्रयोग' यदि विफल होता है, तो यह मगोदावरी नदी के अस्तित्व के लिए भी बड़ा संकट बन सकता है।