Nashik Municipal Corporation MHADA Scam: कुछ महीने पहले नासिक शहर में चर्चा का केंद्र रहे 'म्हाडा घोटाले' की जांच अब अचानक ठंडी पड़ती नजर आ रही है। बिल्डर लॉबी, मनपा प्रशासन और भू-अभिलेख विभाग के कथित गठजोड़ के इस मामले में शुरुआती आक्रामक तेवर अब गायब हो चुके हैं, जिससे सरकार की मंशा और जांच एजेंसियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिन्ह खड़े हो रहे हैं।
इस महाघोटाले में '149' का आंकड़ा सबसे ज्यादा चर्चा में रहा था। शुरुआती दौर में दावा किया गया था कि इतने बिल्डर जांच के दायरे में हैं, लेकिन हैरानी की बात यह है कि आज तक इन 149 संदिग्ध बिल्डरों के नामों का खुलासा जनता के सामने नहीं किया गया।
जनता के बीच अब यह तीखा सवाल उठ रहा है कि इन 149 बिल्डरों में से कितनों पर वास्तविक दंडात्मक कार्रवाई हुई ? भ्रष्ट अधिकारियों और बिल्डरों के गठजोड़ के खिलाफ कितनी एफआईआर दर्ज की गई? क्या बड़े मगरमच्छों को बचाने के लिए जांच को जानबूझकर 'ठंडे बस्ते' में डाल दिया गया ?
विपक्षी दलों ने इस मामले को लेकर सरकार पर कड़े प्रहार किए हैं। विपक्ष का आरोप है कि सरकार बड़े मामलों में शुरुआत में 'धडाकेबाज एक्शन' का नाटक करती है, लेकिन जैसे ही रसूखदारों पर आंच आने की बारी आती है, जांच की धार को कुंद कर दिया जाता है। नासिक म्हाडा प्रकरण को अब इसी संदेहास्पद नजरिए से देखा जा रहा है। लोगों का मानना है कि यदि जांच निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से होती, तो मनपा, भू-अभिलेख और रियल एस्टेट क्षेत्र के कई बड़े सिंडिकेट बेनकाब हो जाते।
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शुरुआती कार्रवाई के दौरान मनपा के निर्माण विभाग, भू-अभिलेख कार्यालय और म्हाडा से जुड़े कई अहम दस्तावेज खंगाले गए थे। उस समय कुछ छोटे कर्मचारियों और बिचौलियों पर कार्रवाई कर सरकार ने भ्रष्टाचार के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' का संदेश देने की कोशिश की थी, परंतु, वर्तमान में जांच की थम चुकी रफ्तार और मामले पर छाई रहस्यमयी चुप्पी ने उस दावे की पोल खोल दी है। अब नासिक वासियों की निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या सरकार फिर से इस मामले की फाइलें खोलेगी, या फिर यह घोटाला भी अन्य फाइलों की तरह इतिहास के पन्नों में कहीं खो जाएगा।