पूनम टावर (सौजन्य-सोशल मीडिया) 
नागपुर

खत्म हुआ पूनम टावर का अवैध कब्जा! 7वीं मंजिल पर चल रहा बुलडोजर, 6वीं तक रह रहे लोगों की बढ़ी धड़कन

Poonam Tower Nagpur: नागपुर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला। पूनम टावर का अवैध निर्माण ध्वस्त। पूनम चैंबर के लिए NMC ने मांगा समय, कोर्ट ने याचिकाकर्ता पर लगाया ₹9.97 लाख का जुर्माना।

प्रिया जैस

Poonam Tower Demolition: नागपुर पूनम टावर्स और पूनम चैंबर्स में हुए अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई कर रिपोर्ट प्रस्तुत करने के आदेश हाई कोर्ट की ओर से दिए गए थे। हाई कोर्ट के आदेशों के अनुसार गुरुवार को मनपा की ओर से पैरवी कर रहे अधिवक्ता जेमीनी कासट ने दोनों के खिलाफ अब तक हुई कार्रवाई का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया।

रिपोर्ट का हवाला देते हुए अधिवक्ता कासट ने कहा कि पूनम टावर्स (Poonam Tower) का अवैध निर्माण पूरी तरह से ध्वस्त कर दिया गया है किंतु पूनम चैंबर्स के लिए अभी 2 माह लगने के कारण समय बढ़ाकर देने का अनुरोध किया। सुनवाई के दौरान तोड़ू कार्रवाई की लागत के रूप में मनपा के पास निधि जमा करने के आदेश दिए जाने के बाद भी इसका पालन नहीं होने की जानकरी भी कोर्ट को दी गई।

इसके बाद न्यायाधीश उर्मिला जोशी फालके और न्यायाधीश निवेदिता मेहता ने याचिकाकर्ता को 9,97,717 रुपये की राशि मनपा के पास जमा करने के अपने पिछले आदेश का पालन न करने पर फटकार लगाई।

6वीं मंजिल तक रह रहे लोग

सुनवाई के दौरान यह बताया गया कि पूनम टावर (Poonam Tower) में बेसमेंट, सर्विस फ्लोर और अन्य अवैध प्रोजेक्शन सहित सभी निर्दिष्ट हिस्सों का विध्वंस कार्य पूरा हो चुका है और यह रिपोर्ट के अनुसार अनुपालन की स्थिति में है। हालांकि पूनम चैंबर के मामले में मनपा ने 2 से 3 महीने का अतिरिक्त समय मांगा है। दलील दी गई कि 7वीं मंजिल पर विध्वंस का काम जारी है, जबकि पहली से 6वीं मंजिल तक लोग रह रहे हैं, जिससे काम में कठिनाई आ रही है। अदालत ने इतनी लंबी अवधि के विस्तार पर सवाल उठाते हुए कहा कि यह काम अधिकतम 15 दिन या 3 सप्ताह में पूरा होना चाहिए।

कोर्ट की अवमानना और 9.97 लाख का जुर्माना

अदालत ने इस बात पर गहरी नाराजगी व्यक्त की कि याचिकाकर्ता को 2 सप्ताह के भीतर 9,97,717 रुपये जमा करने का निर्देश दिया गया था, जिसका अभी तक पालन नहीं किया गया। याचिकाकर्ता के प्रतिनिधि ने तर्क दिया कि वह शहर से बाहर हैं, जिसे अदालत ने उचित कारण मानने से इनकार कर दिया। कोर्ट का मानना था कि रिकॉर्ड से पता चला कि याचिकाकर्ता बार-बार बयान देने के बावजूद उनका पालन नहीं करने के आदी हैं।

कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता ने अपने अधिवक्ता को हटा दिया और खुद पैरवी करने की अनुमति मांगी, लेकिन सुनवाई के दौरान वह खुद भी अनुपस्थित रहे। उनकी जगह एक चार्टर्ड अकाउंटेंट अहूजा अग्रवाल अदालत में उपस्थित हुईं। अदालत ने स्पष्ट किया कि वह याचिकाकर्ता को अपनी ओर से पैरवी करने के लिए किसी निजी व्यक्ति (सीए) को नियुक्त करने की अनुमति नहीं दे सकती और उन्हें उचित कानूनी प्रतिनिधित्व की व्यवस्था करने का निर्देश दिया।

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