Nagpur Accountability Issue: नागपुर महानगर पालिका की सभा में अधिकारियों द्वारा लोकप्रतिनिधियों (जनप्रतिनिधियों) के पत्रों का जवाब न देने और फाइलें छिपाकर रखने के मुद्दे पर गरमागरम बहस हुई। नगरसेवक पिंटू झलके द्वारा लाई गई ध्यानाकर्षण (लक्षवेधी) सूचना के बाद प्रशासन की कार्यप्रणाली, लेटलतीफी और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े किए गए।
सभा में पिंटू झलके ने सवाल उठाया कि 'राइट टू सर्विस एक्ट' (RTS) के तहत किसी भी जनप्रतिनिधि द्वारा जानकारी मांगने पर अधिकारियों को कितने दिनों में जवाब देना अपेक्षित है और तय सीमा में जवाब न देने वाले अधिकारियों पर प्रशासन क्या कार्रवाई करता है।
इसके जवाब में प्रशासन की ओर से स्पष्ट किया गया कि 'राइट टू सर्विस एक्ट' और लोकप्रतिनिधियों को उत्तर देना दोनों अलग-अलग विषय हैं। RTS कानून नागरिकों को अधिसूचित सेवाएं तय समय में उपलब्ध कराने के लिए है।
वहीं जनप्रतिनिधियों (विधायक, सांसद आदि) द्वारा मांगी गई जानकारी या पत्रों का जवाब देने के लिए शासनादेश के अनुसार अधिकतम 2 महीने के भीतर अंतिम उत्तर देने का प्रावधान है। तय समय में जानकारी उपलब्ध न कराने पर दोषी अधिकारी के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की जा सकती है।
अधिकारियों की टालमटोल की नीति को उजागर करने के लिए सदन में महाराष्ट्र महानगर पालिका अधिनियम की धारा 72(क) का विशेष रूप से वाचन किया गया।। किसी भी अधिकारी या कर्मचारी के पास कोई भी सामान्य फाइल 7 कार्य दिवसों से अधिक लंबित नहीं रहनी चाहिए।
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इटनकर ने कहा कि 20 नवंबर 2025 के शासनादेश के उधार पर महानगर पालिका के सदस्यों के लिए भी सामान्य प्रशासन विभाग के माध्यम से एक 'एसओपी तैयार की जाएगी। इसके अलावा सभी सदस्यों को महाराष्ट्र लोकसेवा हक्क अधिनियम 2015 की प्रतियां भी वितरित कर दी गई है।