हाई कोर्ट (फाइल फोटो) 
नागपुर

'लंदन स्ट्रीट' पर हाई कोर्ट का कड़ा प्रहार, पेड़ों की अंधाधुंध कटाई पर स्वयं लिया संज्ञान, प्रशासन को नोटिस

Nagpur London Street Project: नागपुर के लंदन स्ट्रीट प्रोजेक्ट के लिए पेड़ों की कटाई पर हाई कोर्ट सख्त। जनहित याचिका के रूप में लिया संज्ञान, प्रशासन से मांगा जवाब।

प्रिया जैस

Orange Street Tree Felling: खामला से जयताला मार्ग लंदन स्ट्रीट (आरेंज स्ट्रीट) के नाम से परिचित इस मार्ग पर विकास के नाम पर हो रही बड़े पैमाने पर वृक्षों की कटाई को लेकर हाई कोर्ट की ओर से कड़ा रुख अपनाते हुए स्वयं संज्ञान लिया गया। इसे जनहित में स्वीकार कर याचिका के रूप में प्रेषित करने के लिए अधिवक्ता राहुल धांडे की अदालत मित्र के रूप में नियुक्ति भी की।

स्थानीय नागरिक और अधिवक्ता ज्ञानदीप भोंगाडे द्वारा प्रशासनिक न्यायाधीश को लिखे गए पत्र की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने इसे जनहित याचिका के रूप में स्वीकार करने का निर्णय लिया और अदालत मित्र को 2 सप्ताह के भीतर याचिका प्रस्तुत करने का निर्देश दिया।

प्रशासन की गोपनीयता पर सवाल

हाई कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत जानकारी के अनुसार मनपा ने यह जानकारी सार्वजनिक नहीं की है कि योजना के लिए वास्तव में कितने पेड़ काटे गए और उनके बदले कितने नए पेड़ लगाए गए हैं। पत्र में दावा किया गया है कि यह जानकारी देना प्रशासन का कर्तव्य है, लेकिन सामान्य नागरिकों को इस मामले में अंधेरे में रखा जा रहा है।

पर्यावरण और जल स्तर पर खतरे की घंटी

पेड़ों को शहर का 'फेफड़ा' बताते हुए अधिवक्ता भोंगाडे ने आगाह किया कि इस वृक्षतोड़ के कारण जमीन की पानी सोखने की क्षमता कम हो रही है। इसका सीधा असर लगभग 1.5 किलोमीटर दूर स्थित सोनेगांव तालाब के जल स्तर पर पड़ने की संभावना है। साथ ही उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते पौधारोपण और संवर्धन नहीं किया गया, तो नागपुर को भविष्य में दिल्ली जैसी गंभीर प्रदूषण समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।

विकास के नाम पर दशकों पुराने पेड़ों की बलि

प्रस्तावित 'लंदन स्ट्रीट' योजना और मॉल के निर्माण के लिए खामला क्षेत्र में दशकों से अस्तित्व में रहे पुराने पेड़ों को काटा जा रहा है। गत 37 वर्षों से इस क्षेत्र में रह रहे अधिवक्ता भोंगाडे ने बताया कि पुराने मटन मार्केट की जगह पर भी बड़े पैमाने पर पेड़ काटे गए हैं। प्रशासन के पास इस कटाई के बदले किए गए नए पौधारोपण का कोई ठोस प्रमाण उपलब्ध नहीं है, जिससे विकास की प्रक्रिया में पर्यावरण की पूर्णतः बलि दिए जाने की बात सामने आ रही है।

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