नागपुर हाईकोर्ट फैसला( सोर्स: सोशल मीडिया ) 
नागपुर

नागपुर हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, पॉक्सो केस में आरोपी बरी, सबूतों की कमी पड़ी भारी; 20 साल की सजा पलटी

Nagpur High Court Verdict: नागपुर हाईकोर्ट ने पॉक्सो मामले में आरोपी को बरी किया। अदालत ने कहा कि नाबालिग होने के सबूत नहीं मिले और संबंध सहमति से होने के संकेत हैं।

अंकिता पटेल

Nagpur POCSO Case Acquittal: नागपुर जिले के सक्करदरा थाना में आईपीसी और पॉक्सो एक्ट के तहत दर्ज मामले पर सुनवाई के बाद अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने आरोपी सूर्या को पॉक्सो एक्ट की धारा 4, 6 और 10 के साथ-साथ आईपीसी की धारा 363 (अपहरण), 344 (बंधक बनाना) और अन्य धाराओं में दोषी ठहराते हुए 20 साल की कैद और जुर्माने की सजा सुनाई थी।

इसे चुनौती देते हुए हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई। याचिका पर सुनवाई के बाद न्यायाधीश नीरज धोटे ने अहम फैसला सुनाते हुए पॉक्सो अधिनियम और दुष्कर्म के मामले में दोषी ठहराए गए 20 वर्षीय सूयाँ उर्फ दाद्या बाबूराव जांभुलकर को सभी आरोपों से बरी कर दिया।

याचिकाकर्ता की ओर से अधि। अतुल रावलानी और राज्य सरकार की ओर से अधि। स्नेहा धोटे ने पैरवी की। हाई कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अभियोजन पक्ष पीड़िता के नाचालिग होने की बात साबित करने में विफल रहा और पूरे साक्ष्य दोनों के बीच 'सहमति से संबंध' होने की ओर इशारा करते हैं।

रिहायशी इलाका, पीड़िता ने नहीं मचाया

शोर : अभियोजन पक्ष के अनुसार 3 मार्च 2021 की मध्यरात्रि को सूर्या ने कथित तौर पर 15 वर्षीय पीड़िता को झूठे बहाने से अपनी मोटरसाइकिल पर बैठाया और उसे 17 दिनों तक एक झोपड़ी में बंधक बनाकर रखा। आरोप था कि इस दौरान उसने पीड़िता के साथ कई बार दुष्कर्म किया।

सक्करदरा पुलिस स्टेशन ने आईपीसी और पॉक्सो एक्ट के तहत मामला दर्ज किया था। सुनवाई के दौरान अधि। अतुल रावलानी ने तर्क दिया कि यह पूरा मामला प्रेम प्रसंग का था और पीड़िता ने अपनी मर्जी से सूर्या के साथ समय बिताया था। उन्होंने यह भी दलील दी कि जिस जगह पर वे 17 दिन रहे, वह एक रिहायशी इलाका था, लेकिन पीड़िता ने कभी मदद के लिए शोर नहीं मचाया,

उम्र साबित करने में विफल

सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने फैसले में कहा कि पॉक्सी मामले में पीड़िता की उम्र 18 वर्ष से कम) साबित करना अनिवार्य होता है।

अभियोजन पक्ष ने मिडिल स्कूल के क्लर्क को पेश किया, लेकिन पीड़िता के पहले स्कूल (जहा जन्म प्रमाण पत्र के आधार पर दाखिला हुआ था। रिकॉर्ड को साबित करने के लिए किसी गवाह को नहीं बुलाया गया। कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष कानूनी रूप से यह साबित करने में विफल रहा कि घटना के वक्त पीड़िता नाबालिग थी।

कोर्ट ने पाया कि 17 दिनों तक रिहायशी इलाके में रहने के बावजूद पीडिता ने भागने या शोर मचाने की कोई कोशिश नहीं की।

इसके अलावा, मेडिकल जांच करने वाली डॉ. शाश्वती स्वपन घोष को दिए गए विवरण में पीड़िता ने खुद बताया था कि वह फेसबुक के जरिए सूर्या से मिली थी और उसके साथ कमरे पर गई थी, जो अपहरण की कहानी के बिल्कुल विपरीत था।

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