Nagpur High Court Tiger Corridor: मैंगनीज लोह अयस्क निकालने के लिए जारी किए गए 'लेटर ऑफ इंटेंट' को चुनौती देते हुए स्वच्छ एसोसिएशन ने हाई कोर्ट में जनहित याचिका दायर की। याचिका में आरोप लगाया गया है कि यह अनुमति उस क्षेत्र में वन्यजीवों की मौजूदगी को पूरी तरह नजरअंदाज करते हुए और संबंधित विभाग की आवश्यक सिफारिशें प्राप्त किए बिना ही दे दी गई थी। याचिका पर गुरुवार को सुनवाई के दौरान टाइगर कॉरिडोर के निर्धारण और उत्खनन के लिए भूमि आवंटन से जुड़े एक गंभीर मामले में बाघ संरक्षण और निजी विकास परियोजनाओं के बीच का कानूनी टकराव खुलकर उजागर हुआ।
दोनों पक्षों की विरोधाभासी दलीलों और बाघ संरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे को देखते हुए अदालत ने इस मामले को आगे की कार्रवाई और जवाब दाखिल करने के लिए 1 सप्ताह का समय देकर सुनवाई स्थगित कर दी। बाघ अभयारण्यों की बढ़ती संख्या सुनवाई के दौरान यह बात प्रमुखता से उठी कि टाइगर कॉरिडोर का निर्धारण करने के लिए सर्वोच्च और नोडल अथॉरिटी पेंच टाइगर संरक्षण के उपसंचालक की मौजूदगी और भूमिका इस मामले में सबसे अनिवार्य है।
कंपनी के दावों को अदालत में मजबूती से चुनौती दी गई है। यह तथ्य पेश किया गया कि 'नागा नेर' की टाइगर कंजर्वेशन प्लान (बाघ संरक्षण योजना) स्पष्ट रूप से यह दर्शाती है कि यह पूरा विवादित प्रोजेक्ट टाइगर कॉरिडोर के अंतर्गत ही आता है। इसके अतिरिक्त, नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथॉरिटी (NTCA) के एक पत्र का भी हवाला दिया गया जिसमें साफ तौर पर कहा गया है कि बाघ गलियारों का निर्धारण करने के लिए टाइगर कंजर्वेशन प्लान' खुद में एक प्रामाणिक अथॉरिटी है।
यह भी पढें:- कोयला गैसीकरण का राष्ट्रीय हब बनेगा विदर्भ, केंद्र ने दी 37,500 करोड़ की मंजूरी, फडणवीस ने की बड़ी घोषणा
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा कानूनी पेंच 'राज्य वन्यजीव बोर्ड' द्वारा हाल ही में पारित एक प्रस्ताव को लेकर है। शांति जीडी इस्पात एंड पावर कंपनी का दावा है कि बोर्ड के प्रस्ताव के अनुसार केवल एक विशेष रिपोर्ट पर ही विचार किया जाना है और इसी प्रस्ताव के आधार पर उनका प्रोजेक्ट टाइगर कॉरिडोर की सीमा में नहीं आता है। हालांकि अदालत में बताया गया कि राज्य वन्यजीव बोर्ड का यह प्रस्ताव खुद कानूनी कटघरे में है।