Nagpur High Court Maintenance Case: नागपुर बाम्बे हाई कोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने भरण-पोषण से जुड़े एक मामले में यह टिप्पणी की कि केवल शिक्षा के आधार पर पत्नी को भरण-पोषण देने से इनकार नहीं किया जा सकता। उच्च न्यायालय ने कहा कि आजकल बेरोजगारी इतनी बढ़ गई है कि उच्च डिग्री और विशेष कौशल रखने वालों को भी नौकरी नहीं मिल रही है। न्यायमूर्ति उर्मिला जोशी-फाल्के ने पति के इस तर्क को खारिज कर दिया कि स्नातकोत्तर शिक्षित पत्नी स्वयं अपना भरण-पोषण करने में सक्षम है।
न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि पत्नी नौकरी करती है या नहीं अथवा उसकी कोई आय है या नहीं, इससे पति को कोई लेना-देना नहीं है। वर्तमान बेरोजगारी की स्थिति को देखते हुए केवल शिक्षा को इस बात का प्रमाण नहीं माना जा सकता कि वह स्वयं अपना भरण पोषण करने में सक्षम है। उच्च न्यायालय ने कहा कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 में सामाजिक न्याय का प्रावधान है जिसका उद्देश्य महिलाओं और बच्चों को गरीबी तथा निराश्रित अवस्था से बचाना है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण का उद्देश्य किसी व्यक्ति को उसके पूर्व व्यवहार के लिए दंडित करना नहीं बल्कि जरूरतमंद आश्रितों को आर्थिक सुरक्षा प्रदान करना है।
इस मामले में पति ने पारिवारिक न्यायालय के आदेश को चुनौती देते हुए याचिका दायर की थी। पारिवारिक न्यायालय ने पत्ति को अक्टूबर 2017 से दिसंबर 2020 तक पानी को प्रति माह 10,000 तथा बेटी को प्रति माह 5।000 रुपये देने का निर्देश दिया था।
इसके बाद जनवरी 2021 से दिसंबर 2023 तक यह राशि पत्नी के लिए प्रति माह 12,000 और बेटी के लिए प्रति माह 7,000 रुपये कर दी गई। साथ ही जनवरी 2024 से पत्नी को प्रति माह 15,000 और बेटी को प्रति माह 10,000 रुपये देने का आदेश भी जारी किया गया।
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पति का तर्क था कि तलाक के मामले में अलग से भरण-पोषण पहले ही तय किया जा चुका है। हालांकि उच्च न्यायालय ने मामले की परिस्थितियों को देखते हुए दिसंबर 2023 के बाद भी पत्नी को प्रति माह 12,000 और बेटी को प्रति माह 7,000 रुपये देने का आदेश दिया न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि यह राशि तलाक के मामले में तय किए गए भरण-पोषण से अलग होगी। इन टिप्पणियों के साथ उच्च न्यायालय ने पति की याचिका का निपटारा कर दिया।