नागपुर हाई कोर्ट, सीआरपीसी धारा 91 (फोटो सोर्स-सोशल मीडिया)  
नागपुर

नागपुर हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: CRPC की धारा 91 के तहत पुलिस आरोपी को दस्तावेज पेश करने का नोटिस नहीं दे सकती

Nagpur High Court Police Notice: नागपुर हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सीआरपीसी की धारा 91 के तहत पुलिस किसी आरोपी को जांच के लिए दस्तावेज प्रस्तुत करने का नोटिस जारी नहीं कर सकती।

अंकिता पटेल

Nagpur High Court CRPC Section 91: नागपुर याचिकाकर्ता लोकेश रायपुरे द्वारा दायर फौजदारी रिट याचिका पर सुनवाई के बाद हाई कोर्ट ने आदेश जारी कर स्पष्ट किया कि दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 91 के तहत पुलिस किसी आरोपी व्यक्ति को जांच के लिए दस्तावेज पेश करने का नोटिस जारी नहीं कर सकती है।

कोर्ट ने अपने निर्णय में यह स्थापित किया कि यह कानूनी प्रावधान आरोपी व्यक्तियों पर लागू नहीं होता है। याचिकाकर्ता लोकेश पर अपनी बहन और भाई की शिकायत के आधार पर पिता की वसीयत में जालसाजी करने के आरोप में आईपीसी की धारा 419, 420, 465, 467, 468, और 471 के तहत मामला दर्ज किया गया था।

इस मामले की जांच कर रही आर्थिक अपराध शाखा के पुलिस इंस्पेक्टर ने 28 फरवरी 2022 को सीआरपीसी की धारा 91 के तहत एक नोटिस जारी कर आरोपी याचिकाकर्ता से मूल वसीयत पेश करने को कहा था। इसी नोटिस को हाई कोर्ट में चुनौती दी गई थी।

सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों का मिला हवाला

न्या। उर्मिला जोशी-फाल्के और न्या। निवेदिता मेहता ने इस कानूनी सवाल को सुलझाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों, विशेषकर 'स्टेट ऑफ बॉम्बे बनाम काठी कालू ओघड़' (11 जजों की बेंच) और 'स्टेट ऑफ गुजरात बनाम श्यामलाल मोहनलाल चोकसी' (5 जजों की बेंच) का प्रमुखता से हवाला दिया।

अदालत ने स्पष्ट किया कि यद्यपि पुरानी सीआरपीसी की धारा 94 (जो अब धारा 91 है) की भाषा व्यापक प्रतीत होती है, लेकिन विधायिका की मंशा इसमें आरोपी को शामिल करने की नहीं थी।

अदालत ने कहा कि एक आरोपी को अदालत या पुलिस अधिकारी के सामने पेश होने और दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए बुलाना एक अजीब प्रक्रिया होगी। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित कानूनी मिसालों के आधार पर कोर्ट ने यह सुनिश्चित किया कि सीआरपीसी की धारा 91 किसी आरोपी व्यक्ति के खिलाफ लागू नहीं की जा सकती है और न ही इसका इस्तेमाल आरोपी के खिलाफ किया जा सकता है,

संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन

याचिकाकर्ता के वकील ने तर्क दिया कि एक आरोपी को अपने ही खिलाफ साक्ष्य पेश करने के लिए बाध्य करना भारत के संविधान के अनुच्छेद 20(3) का सीधा उल्लंघन है, जो किसी भी व्यक्ति को स्वयं के विरुद्ध गवाह बनने से संरक्षण प्रदान करता है।

वहीं राज्य सरकार ने इसका विरोध करते हुए कहा कि वसीयत पर किए गए हस्ताक्षरों के फर्जीवाड़े की जांच के लिए मूल दस्तावेज को मंगाना जांच अधिकारी के लिए आवश्यक था। इसलिए आरोपी को जारी किया गया नोटिस कानूनी रूप से वैध है।

इन ठोस आधारों पर हाई कोर्ट ने लोकेश रायपुरे की याचिका को आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए आर्थिक अपराध शाखा द्वारा 28 फरवरी 2022 को जारी किए गए विवादित नोटिस को पूरी तरह से रद्द कर दिया।

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