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सरकारी पक्ष के गवाह पलटे, इलेक्ट्रॉनिक सबूतों पर सवाल, भ्रष्टाचार के आरोपों से API और कांस्टेबल बरी

Nagpur News: भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम की विशेष अदालत ने एक महत्वपूर्ण फैसले लेते हुए सामाजिक सुरक्षा विभाग के सहायक पुलिस निरीक्षक और कांस्टेबल शीतल प्रसाद मिश्रा को भ्रष्टाचार के आरोपों से बरी किया।

प्रिया जैस

Nagpur News: नागपुर में भ्रष्टाचार निरोधक अधिनियम की विशेष अदालत ने एक महत्वपूर्ण फैसले में सामाजिक सुरक्षा विभाग के सहायक पुलिस निरीक्षक (एपीआई) दामोदर राजुरकर और कांस्टेबल शीतल प्रसाद मिश्रा को भ्रष्टाचार के आरोपों से बरी कर दिया। दोनों पक्षों की दलीलों के बाद कोर्ट ने शिकायतकर्ता और पंच गवाह के बयानों में महत्वपूर्ण विरोधाभास और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की प्रामाणिकता पर संदेह जताते हुए उक्त आदेश जारी किया।

शिकायतकर्ता एक ब्यूटी और स्पा सेंटर चलाती थी। उसने आरोप लगाया था कि दोनों आरोपियों ने उसे आपराधिक मामले में फंसाने से बचने और उसके स्पा सेंटर को चलाने में सुविधा प्रदान करने के लिए 35,000 रुपये की रिश्वत की मांग की थी। शिकायत मिलने के बाद भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) ने इस मामले में जांच शुरू की थी। जांच दल ने डिजिटल वॉयस रिकॉर्डर (DVR) का उपयोग करके मांग की पुष्टि करने का दावा किया था जब कथित मांग आरोपियों द्वारा दोहराई गई थी।

शिकायतकर्ता की ही तलाशी का प्रयास

आरोपियों को शिकायतकर्ता की संदिग्ध गतिविधियों का आभास हो गया था और उन्होंने एक महिला कांस्टेबल के माध्यम से शिकायतकर्ता की व्यक्तिगत तलाशी लेने की कोशिश की। इससे पहले कि वे ऐसा कर पाते, शिकायतकर्ता ने कथित तौर पर DVR को पंच गवाह के पर्स में डाल दिया और पंच गवाह वहां से चुपचाप खिसक गई।

इसके बाद ACB ने दावा किया कि मांग साबित हो गई थी और चूंकि आरोपियों को कथित जाल के बारे में पता चल गया था, इसलिए उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया और आरोप पत्र दाखिल किया गया। सुनवाई के दौरान शिकायतकर्ता अपने बयान में पूरी तरह से पलट गई और जवाब तलब के दौरान उसने स्वीकार किया कि वास्तव में सामाजिक सुरक्षा शाखा के पुलिस निरीक्षक बेसरकर ने अवैध रिश्वत की मांग की थी, न कि आरोपी व्यक्तियों ने।

वॉयस रिकॉर्डिंग पर भरोसा नहीं

आरोपियों की ओर से सुनवाई के दौरान अधिवक्ता प्रकाश नायडू ने कहा कि उन वॉयस रिकॉर्डिंग पर कोई भरोसा नहीं किया जा सकता क्योंकि वह साक्ष्य अधिनियम के अनिवार्य मापदंडों को पूरा नहीं करती थी और उसकी प्रामाणिकता का कोई प्रमाण नहीं था या यह नहीं माना जा सकता है कि उसमें छेड़छाड़ नहीं की गई थी।

नायडू ने बताया कि आरोपी अधिकारियों ने पहले शिकायतकर्ता को 3 बार उसकी अवैध गतिविधियों के लिए गिरफ्तार किया था जिन्हें वह स्पा सेंटर की आड़ में अनैतिक व्यापार निवारण अधिनियम के तहत अंजाम देती थी। आरोपियों की ओर से अधिवक्ता प्रकाश नायडू, होमेश चौहान, मितेश बैस, सुरभि नायडू (गोडबोले) और ध्रुव शर्मा ने पैरवी की।

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