Balasaheb Thackeray Birth Centenary: शिवसेना प्रमुख बालासाहेब ठाकरे की 100वीं जयंती (23 जनवरी) के अवसर पर शुक्रवार को मुंबई के षण्मुखानंद हॉल में आयोजित एक विशेष कार्यक्रम में महाराष्ट्र की राजनीति का एक दुर्लभ दृश्य देखने को मिला, जब उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे एक बार फिर एक ही मंच पर साथ नजर आए। इस मौके पर मनसे प्रमुख राज ठाकरे ने मौजूदा राजनीतिक हालात पर तीखा प्रहार करते हुए कहा, “आज के हालात देखकर लगता है कि अच्छा है कि आज बालासाहेब नहीं हैं।”
राज ठाकरे ने वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य पर गहरी निराशा व्यक्त करते हुए कहा, “आज महाराष्ट्र की राजनीति गुलामों का बाजार बन गई है, जहां लोगों की नीलामी हो रही है। अगर आज बालासाहेब जीवित होते, तो यह सब देखकर उन्हें कितनी पीड़ा होती। वे यह कभी सहन नहीं कर पाते।” उन्होंने कहा कि पिछले 20 वर्षों में उन्होंने और उद्धव ठाकरे ने बहुत कुछ समझा है और अब पुरानी कड़वाहट को पीछे छोड़ने का समय आ गया है।
अपने भाषण में राज ठाकरे पहली बार अपने अलगाव के दर्द पर खुलकर बोले। उन्होंने कहा, “जब मैंने 2005 में शिवसेना छोड़ी, तो वह केवल पार्टी छोड़ना नहीं था, बल्कि अपने घर से बाहर निकलने जैसा था। पिता का साया पहले ही उठ चुका था और फिर अपने चाचा बालासाहेब से दूर जाना मेरे लिए बेहद कष्टदायक था।” राज की इन भावुक बातों को सुनकर मंच पर बैठीं उद्धव ठाकरे की पत्नी रश्मि ठाकरे अपने आंसू नहीं रोक सकीं।
राज ठाकरे ने बचपन का एक प्रसंग साझा करते हुए बताया कि जब वे उबलते पानी से झुलस गए थे, तब बालासाहेब रोज सुबह स्वयं डेटॉल और कपास लेकर उनके घाव साफ करते थे। उन्होंने कहा कि राजनीति के पीछे बालासाहेब एक बेहद संवेदनशील कलाकार और पारिवारिक व्यक्ति थे।
राज ठाकरे ने कहा कि बालासाहेब केवल एक नेता नहीं, बल्कि एक चलता-फिरता विश्वविद्यालय थे। उनके कार्टून की हर रेखा में स्पष्टवादिता और साहस झलकता था। उन्होंने जनता से अपील की कि इस शताब्दी वर्ष में बालासाहेब को केवल याद न करें, बल्कि उनके भाषणों, साक्षात्कारों और व्यंग्यचित्रों को नए नजरिए से पढ़ें और समझें।