तीन भाषा नीति पर सुप्रीम कोर्ट ने CBSE को दिया बड़ा झटका, नेटिव शब्द पर उठाए गंभीर सवाल

CBSE 3 Language Policy: SC ने CBSE की तीन भाषा नीति पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कक्षा 6 के छात्रों पर से मानसिक तनाव कम करने और अंग्रेजी को नॉन-नेटिव कहने पर कड़ा ऐतराज जताया है।
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सांकेतिक फोटो सोर्स- सोशल मीडिया
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Supreme Court On CBSE Three Language Policy: केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) की तीन भाषा नीति को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद महत्वपूर्ण और दूरगामी टिप्पणी की है। कोर्ट ने CBSE से इस नीति पर दोबारा विचार करने को कहा है और विशेष रूप से कक्षा 6 के छात्रों के ऊपर से मानसिक तनाव व व्यावहारिक बोझ को कम करने के लिए राहत देने के रास्ते तलाशने का सुझाव दिया है। इसके साथ ही, अदालत ने अंग्रेजी भाषा को गैर-मूल यानी नॉन-नेटिव श्रेणी में रखे जाने पर भी गंभीर आपत्ति जताई है।

नेटिव शब्द औपनिवेशिक सोच का प्रतीक

सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने अंग्रेजी को गैर-देशज भाषा मानने की दलीलों पर कड़ा ऐतराज जताया। उन्होंने कहा कि 'नेटिव' यानी 'मूल निवासी' शब्द के इस्तेमाल को लेकर उन्हें गंभीर आपत्ति है, क्योंकि इसमें औपनिवेशिक मानसिकता की झलक मिलती है। जस्टिस बागची ने सुझाव दिया कि इस शब्द के स्थान पर 'इंडिजिनस' यानी 'देशज' या 'स्वदेशी' शब्द का उपयोग किया जाना चाहिए।

उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत में अंग्रेजी का एक लंबा इतिहास रहा है और भारतीय समाज में इसकी जड़ें बहुत गहरी जम चुकी हैं। संवैधानिक और नीतिगत स्तर पर इस बात का गहन मूल्यांकन होना चाहिए कि अंग्रेजी को किस सीमा तक गैर-देशज माना जा सकता है। जस्टिस बागची के अनुसार, इस संवैधानिक उलझन को सुलझाने से वर्तमान शिक्षा प्रणाली और भाषा नीति की कई विसंगतियों व खामियों को दूर किया जा सकता है।

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कक्षा 6 से तीसरी भाषा लागू करने का क्या है पूरा विवाद?

वर्तमान व्यवस्था के तहत स्कूलों में कक्षा 6 से ही तीसरी भाषा अनिवार्य रूप से पढ़ाई जा रही है, जो लंबे समय से बहस का विषय बनी हुई है। संसद की एक उच्च स्तरीय समिति ने भी अपनी रिपोर्ट में इस नीति की बड़ी खामियों को उजागर किया है। समिति की 10वीं रिपोर्ट (वर्ष 2026-27 के अनुमानों पर लोकसभा में पेश) में यह बात सामने आई है कि स्कूलों को इस नई त्रि-भाषा व्यवस्था को जमीन पर लागू करने के लिए पर्याप्त समय और संसाधन नहीं दिए गए।

अचानक नीति थोपे जाने के कारण स्कूलों को निम्नलिखित बुनियादी ढांचागत और व्यावहारिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है:

  • योग्य भाषा शिक्षकों की भारी कमी: क्षेत्रीय और स्थानीय भाषाओं को पढ़ाने के लिए पर्याप्त क्वालिफाइड टीचर्स ही मौजूद नहीं हैं।

  • अध्ययन सामग्री की अनुपलब्धता: पाठ्यक्रम के अनुसार किताबें और स्टडी मैटेरियल समय पर तैयार नहीं हो सका।

  • शिक्षकों के प्रशिक्षण का अभाव: जो शिक्षक पहले से पढ़ा रहे हैं, उन्हें तीसरी भाषा सिखाने और नए फॉर्मेट में ढलने के लिए आवश्यक ट्रेनिंग नहीं दी गई।

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बदलाव की तैयारी में सरकार

इस चुनौती से निपटने के लिए शिक्षा मंत्रालय ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के सहयोग से त्रि-भाषा फॉर्मूले में कुछ बड़े ढांचागत सुधार किए हैं। इसके तहत नया R1, R2, R3 भाषा ढांचा तैयार किया गया है, जिसकी संसदीय समिति ने भी सराहना की है।

विद्यार्थियों की राह आसान बनाने के लिए सरकार ने कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं:

  • 22 भाषाओं में अनुवाद: गणित, विज्ञान और सामाजिक विज्ञान जैसे मुख्य विषयों की पुस्तकों को भारतीय संविधान की 22 अनुसूचित भाषाओं में अनुवादित किया गया है।

  • ब्रिज कोर्स और ई-कंटेंट: भाषाओं के बीच ट्रांजिशन को स्मूथ बनाने के लिए विशेष ब्रिज कोर्स और ऑनलाइन डिजिटल कंटेंट उपलब्ध कराया गया है।

  • 'जादुई पिटारा' और 'भाषा संगम': शुरुआती स्तर पर बच्चों को खेल-खेल में सिखाने के लिए 22 भाषाओं में 'जादुई पिटारा' नामक खेल-आधारित लर्निंग किट बनाई गई है। साथ ही 'भाषा संगम' कार्यक्रम के माध्यम से छात्रों को विभिन्न भाषाओं से परिचित कराया जा रहा है।

  • मातृभाषा प्राइमर: केंद्रीय भारतीय भाषा संस्थान (CIIL) के सहयोग से 121 मातृभाषा प्राइमर विकसित किए गए हैं।

  • कांट्रैक्ट पर स्थानीय शिक्षकों की भर्ती: केंद्रीय विद्यालयों (KVs) जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में स्थानीय भाषाओं के अध्यापन के लिए कानट्रेक्ट बेसिस पर शिक्षकों की नियुक्ति की जा रही है।

क्या छात्रों को मिलेगी बड़ी राहत?

संसदीय समिति ने साफ तौर पर माना है कि तीसरी भाषा को लागू करने से पहले स्कूलों की वास्तविक जमीनी हकीकत और जरूरतों का ठीक से आकलन नहीं किया गया था। इसके कारण क्लास 6 के नन्हे छात्रों और स्कूलों पर बेवजह का दबाव बढ़ा है। अब जब सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में सीधे हस्तक्षेप करते हुए केंद्र सरकार, CBSE और NCERT को नोटिस जारी कर इस नीति पर पुनर्विचार करने को कहा है, तो देश भर के अभिभावकों, शिक्षकों और छात्रों की उम्मीदें बढ़ गई हैं।

अब देखना यह होगा कि सुप्रीम कोर्ट के इस कड़े रुख के बाद CBSE अपनी भाषा नीति में क्या बदलाव करता है और कक्षा 6 के छात्रों के मानसिक तनाव को कम करने के लिए क्या नए व्यावहारिक कदम उठाए जाते हैं।

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