Kapde Nahi Utarenge Movement (डिजाइन फोटो) 
मुंबई

'कपड़े नहीं उतारेंगे', 'मेरा शरीर राज्य की संपत्ति नहीं', आजाद मैदान में ट्रांसजेंडर विधेयक के खिलाफ प्रदर्शन

Kapde Nahi Utarenge Movement: मुंबई के आज़ाद मैदान में क्वीर समुदाय ने ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक 2026 के खिलाफ प्रदर्शन किया। 'कपड़े नहीं उतारेंगे' अभियान से की विधेयक वापस लेने की मांग।

अनिल सिंह

Protest Against Transgender Bill 2026: मुंबई के आज़ाद मैदान में बुधवार को क्वीर (Queer) और ट्रांसजेंडर समुदाय के सैकड़ों लोग 'कपड़े नहीं उतारेंगे' के नारों के साथ लामबंद हुए। यह विरोध प्रदर्शन केंद्र सरकार द्वारा प्रस्तावित 'ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकारों का संरक्षण) संशोधन विधेयक 2026' के खिलाफ आयोजित किया गया।

प्रदर्शनकारियों का आरोप है कि यह विधेयक उनके आत्म-पहचान के संवैधानिक अधिकार का गला घोंटता है और उन्हें अपमानजनक शारीरिक जांच की ओर धकेलता है।लोकसभा में विधेयक पारित होने के बावजूद, मुंबई क्वीर प्राइड और विभिन्न कार्यकर्ताओं ने इसे पूरी तरह वापस लेने की मांग की है।

'कपड़े नहीं उतारेंगे' अभियान: आत्म-सम्मान की लड़ाई

इस आंदोलन का मुख्य उद्देश्य 'ट्रांसजेंडर संशोधन विधेयक' केउस प्रावधान का विरोध करना है, जो ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को अपनी पहचान साबित करने के लिए चिकित्सा जांच या नौकरशाही प्रमाणपत्रों पर निर्भर बनाता है। कार्यकर्ता जैमिनी बाविस्कर ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा, "सरकारी अधिकारियों को मेरा लिंग तय करने का कोई अधिकार नहीं है। यदि सिसजेंडर (Cisgender) लोगों को अपनी पहचान के लिए अस्पताल नहीं जाना पड़ता, तो हमारे लिए यह भेदभाव क्यों? हम अपनी पहचान साबित करने के लिए किसी के सामने कपड़े नहीं उतारेंगे।" समुदाय का तर्क है कि यह प्रक्रिया उनके निजी जीवन में हिंसक हस्तक्षेप है।

NALSA फैसले का उल्लंघन और बहिष्कार का डर

2014 के ऐतिहासिक NALSA फैसले ने बिना किसी मेडिकल सर्जरी के 'स्व-पहचान' (Self-identification) को कानूनी मान्यता दी थी। प्रदर्शनकारियों का दावा है कि नया संशोधन इस फैसले को कमजोर करता है। प्रसिद्ध कार्यकर्ता ज़ैनब पटेल के अनुसार, यह विधेयक केवल चार विशिष्ट समुदायों (किन्नर, हिजड़ा, अरावनी और जोगता) को पहचानता है, जबकि ट्रांस-पुरुषों और गैर-बाइनरी (Non-binary) लोगों को पूरी तरह नजरअंदाज कर देता है। शाइन रहमान जैसे ट्रांस-पुरुष कार्यकर्ताओं ने आरोप लगाया कि कानून बनाने से पहले समुदाय के साथ कोई ठोस परामर्श नहीं किया गया।

चुने हुए परिवारों को अपराधी बनाने का आरोप

विधेयक में 'जबरदस्ती' जैसे अस्पष्ट शब्दों के इस्तेमाल पर भी चिंता जताई गई है। कार्यकर्ताओं का मानना है कि इन प्रावधानों का दुरुपयोग उन लोगों और सहयोगियों को सजा देने के लिए किया जा सकता है, जो ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को उनके जैविक परिवारों के बजाय 'चुने हुए परिवारों' (Chosen families) में रहने में मदद करते हैं। मुंबई प्रेस क्लब में हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में मांग की गई कि इस विधेयक को तत्काल संसदीय स्थायी समिति के पास भेजा जाए और 2014 के सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों को अक्षुण्ण रखा जाए।

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