Prisoner Rehabilitation Initiative In Maharashtra: महाराष्ट्र में कैदियों के जीवन को बदलने और उन्हें अपराध का रास्ता छुड़ाकर समाज की मुख्यधारा में शामिल करने के लिए एक अभूतपूर्व अभियान चलाया जा रहा है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की दूरदर्शी सोच के तहत गृह विभाग और टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) ने मिलकर जेलों में बंदियों के व्यापक पुनर्वास की नींव रखी है।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में राज्य की अलग-अलग जेलों में कैदियों के पुनर्वास के लिए एक खास पहल शुरू की गई है। इसका उद्देश्य कैदियों को अपराध का रास्ता छोड़ने, समाज की मुख्यधारा में लौटने, सम्मान के साथ जीने और उनके परिवारों के लिए स्थिरता सुनिश्चित करने में मदद करना है।
इसके लिए टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेज (TISS) के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए गए हैं। इस पहल के जरिए, कैदियों को आपराधिक दुनिया छोड़ने और सकारात्मक जीवन अपनाने के लिए जरूरी मानसिक और सामाजिक मजबूती मिल रही है, जिससे उनका सफल पुनर्वास हो रहा है।
मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने इस संवेदनशील मुद्दे को सिर्फ कानून, व्यवस्था या सजा के नजरिए से नहीं, बल्कि व्यापक सामाजिक सुधार के मामले के तौर पर देखा है। इस सुधारात्मक अभियान का दायरा तेजी से विस्तृत हो रहा है। वर्तमान में राज्य के शीर्ष केंद्रीय कारागारों जैसे मुंबई, यरवदा (पुणे), ठाणे, तलोजा, नासिक और नागपुर में इसे बेहद प्रभावी ढंग से संचालित किया जा रहा है।
इसके साथ ही, जिला स्तर पर भायखला, कल्याण, अलीबाग और लातूर जैसी जेलों में भी इस मिशन को पूरी गति से आगे बढ़ाया जा रहा है। जेलों के भीतर का माहौल अब केवल बंदिशों का नहीं, बल्कि आत्म-सुधार का केंद्र बनता जा रहा है, जिससे कैदियों में सकारात्मक दृष्टिकोण का संचार हो रहा है।
इस पहल को तीन मुख्य पहलुओं पर ध्यान केंद्रित करने के लिए डिजाइन किया गया है। कैदियों की कानूनी जागरूकता, मानसिक व शारीरिक देखभाल और आर्थिक भलाई।
इस पहल के तहत साल 2017 से 2026 के बीच बड़ी संख्या में कैदियों को फायदा मिला है। इस प्रोग्राम के तहत, 5308 कैदियों को हाई कोर्ट में जमानत और अपील के मामले में मदद मिली है। इसके अलावा, 8,576 कैदियों ने कानूनी मदद के लिए जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण में आवेदन किया है। अलग-अलग जेलों में कुल 205 कानूनी जागरूकता कार्यक्रम और 318 हेल्थ कैंप आयोजित किए गए। इन पहलों के जरिए 2,758 कैदियों ने अलग-अलग व्यावसायिक कौशल में ट्रेनिंग सफलतापूर्वक पूरी की। राज्य में 6,683 कैदियों को उनके बच्चों से सीधे मिलने-जुलने में मदद दी गई और 1,378 कैदियों के बच्चों को शिक्षा में सहायता दी गई। साथ ही 3,545 कैदियों को सरकारी योजनाओं का फायदा उठाने के लिए आवेदन करने में मदद की गई।
इस पहल की एक खास बात कैदियों और उनके परिवारों के बीच टूटे हुए रिश्तों को फिर से जोड़ना है। कैदियों और उनके परिवारों के बीच नियमित और सम्मानजनक बातचीत की सुविधा दी जा रही है। इस प्रोग्राम का शायद सबसे संवेदनशील पहलू कैदियों को उनके छोटे बच्चों से बिना किसी रुकावट के आमने-सामने मिलने और उन्हें गले लगाने का मौका देना है। माना जाता है कि इससे जिम्मेदार माता-पिता और परिवार के सदस्य के तौर पर जीने की इच्छा पैदा होती है, जिससे आपराधिक सोच को खत्म करने में मदद मिलती है।
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यह पहल सिर्फ़ जेल में रहने के समय तक ही सीमित नहीं है; कैदी के रिहा होने के बाद समाज में उन्हें स्वीकार किए जाने के लिए भी इंतजाम किए गए हैं। उन्हें केंद्र और महाराष्ट्र सरकार की अलग-अलग कल्याणकारी और स्वरोजगार योजनाओं का सीधा फायदा दिलाने में मदद दी जाती है, ताकि वे रिहाई के बाद समाज में सम्मान के साथ जी सकें। उन्हें बैंक लोन, पहचान पत्र और दूसरे जरूरी कागजात हासिल करने में भी मदद दी जाती है।