मिड डे मील का फंड 4 महीने से अटका, शिक्षक अपनी जेब से खर्च करने को मजबूर।
‘स्पर्श’ व्यवस्था में देरी और तकनीकी दिक्कतों से बजट अटका।
प्राथमिक छात्रों को रोजाना ₹2.59 और उच्च प्राथमिक को ₹3.71 मिलते हैं।
एलपीजी खत्म होने पर कई स्कूलों में लकड़ी से खाना पकाने की नौबत।
Maharashtra Mid Day Meal Scheme Fund: महाराष्ट्र के सरकारी स्कूलों में संचालित मिड डे मील योजना आर्थिक और प्रशासनिक समस्याओं से जूझ रही है। राज्य के करीब 70 प्रतिशत हिस्से में सूखे की स्थिति के बीच योजना का फंड पिछले चार महीनों से अटका हुआ है।
इसका असर स्कूली बच्चों को मिलने वाले भोजन पर पड़ रहा है। स्थिति ऐसी हो गई है कि कई स्कूलों में शिक्षक और प्रधानाध्यापक बच्चों को भोजन उपलब्ध कराने के लिए अपनी जेब से पैसे खर्च कर रहे हैं।
अधिकारियों के मुताबिक, केंद्रीय योजनाओं में प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण से जुड़ी नई व्यवस्था के तहत सिंगल नोडल एजेंसी ‘स्पर्श’ को अपनाने में देरी हुई। इसके अलावा नए सॉफ्टवेयर में केंद्र और राज्य सरकार के फंड को एकीकृत करने के दौरान तकनीकी समस्याएं सामने आईं। इसी वजह से पिछले चार महीनों से योजना की राशि अटकी हुई है।
दूसरी ओर, सूखे के कारण ग्रामीण क्षेत्रों में परिवारों की आय प्रभावित हुई है। ऐसे हालात में गरीब परिवारों के बच्चों के लिए पौष्टिक भोजन की उपलब्धता और भी महत्वपूर्ण हो गई है। स्कूलों में नियमित भोजन की व्यवस्था बनाए रखना शिक्षकों के लिए चुनौती बनता जा रहा है।
योजना के तहत कक्षा पहली से पांचवीं तक के प्रत्येक विद्यार्थी के लिए प्रतिदिन 2.59 रुपये और कक्षा छठी से आठवीं तक के विद्यार्थियों के लिए 3.71 रुपये की राशि निर्धारित होने की जानकारी दी गई है। शिक्षकों का सवाल है कि बढ़ती महंगाई के बीच इतनी कम राशि में सब्जियां, अन्य खाद्य सामग्री और ईंधन का खर्च कैसे पूरा किया जाए।
उनका कहना है कि मौजूदा लागत के मुकाबले उपलब्ध राशि अपर्याप्त पड़ रही है। ऐसे में भोजन की गुणवत्ता और नियमित आपूर्ति बनाए रखना मुश्किल हो रहा है।
महाराष्ट्र राज्य के कई स्कूलों में महीनेभर के लिए उपलब्ध कराया जाने वाला एलपीजी सिलेंडर समय से पहले खत्म हो जाता है। इसके बाद भोजन पकाने के लिए शिक्षकों को लकड़ी का इंतजाम करना पड़ता है। फंड में देरी के कारण स्कूलों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ भी पड़ रहा है।
योजना के सुचारु संचालन के लिए लंबित राशि जारी करना और भुगतान व्यवस्था से जुड़ी तकनीकी समस्याओं को दूर करना जरूरी है। फिलहाल, शिक्षकों और स्कूल प्रशासन के सामने बच्चों को नियमित भोजन उपलब्ध कराने की चुनौती बनी हुई है।