traditional wrestling (सोर्सः सोशल मीडिया) 
मुंबई

मुंबई में परंपरागत कुश्ती पर घटता युवाओं का रुझान, महंगे खानपान और जिम ट्रेंड से कुश्ती अखाड़े सूने

Mumbai Wrestling Akhada: मुंबई में पारंपरिक कुश्ती अखाड़ों से युवाओं का रुझान घट रहा है, महंगे खानपान, जिम ट्रेंड और कम सरकारी अवसर इसके प्रमुख कारण बन रहे हैं।

आंचल लोखंडे

Kushti Players Mumbai: सुबह के 5 बजे हैं। भायखला के मदनपुरा स्थित झूला मैदान के अखाड़े में पहलवानों का रियाज़ चल रहा है। पहलवान कुछ युवाओं को कुश्ती की बारीकियां सिखा रहे हैं। यह वही कुश्ती का अखाड़ा है, जहां से गामा, भोलू, अकरम, असाब मलिक और इस्लाम चक्कीवाला जैसे कई नामी-गिरामी पहलवानों ने विदेशी पहलवानों को धूल चटाई थी। ब्रिटिश कालीन इस अखाड़े के पहलवानों ने जो पहचान बनाई थी, उसे आज के युवा पहलवानों के लिए सहेजना मुश्किल हो रहा है। मिर्जापुर केसरी पहलवान अली खान ने बताया कि युवाओं का रुझान अब कुश्ती अखाड़ों की ओर कम हो गया है।

एक दौर था जब मुंबई में कई जगहों पर कुश्ती हुआ करती थी। त्योहारों पर दंगल आयोजित होते थे। अखाड़े की मिट्टी, पहलवानों का दम और भीड़ का जोश दंगल को मेले में तब्दील कर देता था, जहां ताकत, तकनीक और परंपरा का आमना-सामना होता था। उस समय मुंबई शहर और उपनगरों में 50 से अधिक कुश्ती अखाड़े हुआ करते थे, जो अब घटकर लगभग 10 रह गए हैं।

कुश्ती अखाड़ों में जाने से कतराने लगी युवा पीढ़ी

इनमें सेंट्रल रेलवे माटुंगा, जोगेश्वरी अखाड़ा, लालबाग अखाड़ा और कुर्ला अखाड़ा प्रमुख हैं। इन अखाड़ों में जहां युवा पहलवान कुश्ती के दांव सीखते थे, वहीं पुराने पहलवान शोध कर नए दांव भी तैयार करते थे। पहलवान हर दांव पर महीनों अभ्यास करके महारत हासिल करता था। इन अखाड़ों से ओलंपिक चैंपियन नरसिंह यादव, महाराष्ट्र केसरी उदयराज पहलवान, संदीप पहलवान, संजय यादव, युवराज बाघ, दिलीप पवार और नामदेव बंदरे जैसे चर्चित पहलवानों ने देश का नाम रोशन किया है।

कुश्ती के प्रति रुझान घटा

बीते कुछ दशकों में लोगों में कुश्ती के प्रति रुझान घटा है। युवा वर्ग अब शरीर पर मिट्टी लगाने से कतराने लगा है। शरीर को मजबूत बनाने के लिए युवा अब जिम की ओर अधिक आकर्षित हो रहे हैं। आम तौर पर कुश्ती की शुरुआत 16-17 वर्ष की आयु में होती है। कुश्ती खेलने वाले पहलवानों का खानपान काफी महंगा होता है। जहां जिम जाने वाले बच्चे प्रोटीन सप्लीमेंट पर निर्भर रहते हैं, वहीं अखाड़े में कुश्ती करने वाले पहलवानों को बादाम, देशी घी, दूध और सूखे मेवों की आवश्यकता पड़ती है।

महंगे खानपान के कारण भी युवा कुश्ती से दूर हो रहे हैं। क्रिकेट जैसे खेलों की तुलना में कुश्ती में आर्थिक लाभ कम है। राष्ट्रीय स्तर पर भी कुश्ती की लोकप्रियता में कमी आई है। हालांकि ‘दंगल’ और ‘सुल्तान’ जैसी कुश्ती आधारित फिल्मों से युवाओं में जागरूकता बढ़ी, लेकिन यह रुझान स्थायी नहीं बन पाया।

प्रतिक्रिया

मुंबई शहर उपनगर कुश्ती संघ के अध्यक्ष अवनीश तीर्थराज सिंह ने कहा कि “कुश्ती हमारा पारंपरिक खेल है। इसे बचाने के लिए सरकार को पहल करनी चाहिए। खिलाड़ियों को ट्रेनिंग के साथ बेहतर सुविधाएं मिलनी चाहिए। पहले सरकारी कोटे से नौकरी मिल जाती थी, अब नहीं मिलती। बीएमसी के डीपी प्लान में भी कुश्ती अखाड़ों को स्थान मिलना चाहिए।”

पहलवान असाब मलिक ने कहा कि “रेलवे और आर्मी जैसी सरकारी नौकरियों में भर्ती कम हो गई है। पहले कुश्ती के युवा आसानी से इन सेवाओं में चले जाते थे। अब आर्मी में चार साल की नौकरी होने से युवाओं का रुझान घटा है। कुश्ती का खेल अब हरियाणा, पंजाब, महाराष्ट्र और यूपी में ही सिमट गया है।”

मिर्जापुर केसरी अली खान ने कहा कि “पहलवान अक्सर गरीब परिवारों से निकलते हैं। कुश्ती युवाओं को मजबूत शरीर और स्वस्थ जीवन के लिए प्रेरित करती है।”

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