Haffkine Bio Pharmaceutical Controversy: राज्य सरकार के अधीन संचालित हैफकाइन बायो-फार्मास्युटिकल कॉर्पोरेशन लिमिटेड एक बार फिर विवादों में घिर गई है।
कंपनी में कथित गंभीर अनियमितताओं, जांच रिपोर्ट के गायब होने और मंत्रियों के स्पष्ट निर्देशों की अवहेलना के आरोपों के बीच नया सर्कुलर जारी किया गया है।
सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे इस सर्कुलर में कर्मचारियों को चेतावनी दी गई है कि यदि किसी ने आंतरिक दस्तावेज साझा किए तो उसके खिलाफ विभागीय और आपराधिक कार्रवाई की जाएगी। हालांकि सर्कुलर पर कोई फ़ाइल नंबर या आउटगोइंग नंबर अंकित नहीं है, जिससे इसकी वैधता को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
आरटीआई कार्यकर्ताओं का आरोप है कि जनसूचना अधिकार कानून की धारा 4 के तहत स्वप्रकाशन की अनिवार्यता को नजरअंदाज किया गया है। कंपनी के कुछ अधिकारियों पर सरकारी धन के निजी इस्तेमाल और निजी खरीदारी के आरोप भी लगे हैं। इन आरोपों के बाद आरटीआई कार्यकर्ताओं ने एसीबी और उच्च स्तरीय जांच की मांग करते हुए शिकायत दर्ज कराई है।
बताया जा रहा है कि विधानसभा उपाध्यक्ष अन्ना बन्सोड, तत्कालीन उपमुख्यमंत्री अजित पवार और एफडीए मंत्री नरहरि झिरवाल ने हाफकिन में कार्यरत कुछ अधिकारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई के निर्देश दिए थे।
उमेश वसंत पवार, नवनाथ रामदास गर्जे और संपदा समीर पटवर्धन के खिलाफ गंभीर आरोप दर्ज किए गए थे। आरोप है कि कार्रवाई करने के बजाय नवनाथ गर्जे को महाप्रबंधक पद का अतिरिक्त प्रभार सौंप दिया गया।
इस पूरे मामले ने प्रशासनिक पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि एसीबी या उच्च स्तरीय जांच शुरू होती है, तो कंपनी के भीतर चल रहे कथित अनियमितताओं के मामले और गहराई से सामने आ सकते हैं। फिलहाल कंपनी की ओर से आधिकारिक स्पष्टीकरण का इंतजार है, जबकि सोशल मीडिया पर यह मुद्दा लगातार चर्चा में बना हुआ है।