Dharavi Redevelopment Residents Protest News: एशिया की सबसे बड़ी झोपड़पट्टी पुनरुद्धार परियोजना यानी धारावी पुनर्विकास को लेकर स्थानीय रहिवासियों का असंतोष अब खुलकर सामने आने लगा है। अपनी आजीविका, घर और भविष्य को लेकर चिंतित रहिवासियों ने अब अपने हक की आवाज बुलंद कर दी है।
माटुंगा लेबर कैंप क्षेत्र में आयोजित एक बड़ी जनजागृति बैठक के दौरान रहिवासियों ने साफ तौर पर मांग की है कि पुनर्विकास का संपूर्ण मास्टर प्लान जनता के सामने सार्वजनिक किया जाए और प्रत्येक रहिवासी के पुनर्वास की पूरी तरह लिखित व कानूनी गारंटी दी जाए। जब तक ये मांगें पूरी नहीं होतीं, तब तक अडाणी समूह के साथ किसी भी प्रकार का करार न करने का बड़ा आह्वान किया गया है।
माटुंगा लेबर कैंप क्षेत्र में आयोजित एक बड़ी जनजागृति बैठक के दौरान रहिवासियों ने साफ तौर पर मांग की है कि पुनर्विकास का संपूर्ण मास्टर प्लान जनता के सामने सार्वजनिक किया जाए और प्रत्येक रहिवासी के पुनर्वास की पूरी तरह लिखित व कानूनी गारंटी दी जाए। जब तक ये मांगें पूरी नहीं होतीं, तब तक अडाणी समूह के साथ किसी भी प्रकार का करार न करने का बड़ा आह्वान किया गया है।
माटुंगा लेबर कैंप सेक्टर-1 स्थित आनंद ग्राहक सोसायटी में विश्वरत्न डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर वाचनालय के तत्वावधान में धारावी पुनर्विकास की पृष्ठभूमि में संभावित विस्थापन के विरोध में एक अहम जनजागृति बैठक का आयोजन किया गया। इस बैठक में सिद्धार्थ नगर, आंबेडकर नगर, रमाबाई नगर, भीमनगर, मिलिंद नगर, समता नगर, संजय गांधी नगर तथा डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर रोड परिसर की विभिन्न चॉलों से बड़ी संख्या में स्थानीय रहिवासी शामिल हुए। बैठक का मुख्य स्वर यही था कि बिना किसी आधिकारिक और पारदर्शी मास्टर प्लान के रहिवासियों पर किसी भी तरह का दबाव न बनाया जाए और न ही कोई जल्दबाजी में समझौता किया जाए।
बैठक के दौरान सामाजिक कार्यकर्ता संजय रमेश भालेराव ने कड़े शब्दों में कहा कि केवल सर्वेक्षण हो जाने मात्र से किसी भी रहिवासी का पुनर्वास अधिकार सुरक्षित नहीं हो जाता। रहिवासियों की ओर से स्पष्ट मांग रखी गई है कि झोपड़ीधारकों को कम से कम 500 वर्गफुट का घर दिया जाए, जबकि चॉल, इमारतों और अन्य वैध संपत्तियों में रहने वाले परिवारों को कम से कम 1,000 वर्गफुट का घर मिलना चाहिए।
इसके साथ ही 'की-टू-की' पुनर्वास नीति को लेकर भी कई गंभीर सवाल उठाए गए। पुनर्वास आखिरकार कहां होगा, संक्रमणकालीन (ट्रांजिट) व्यवस्था क्या होगी और सरकारी संपत्तियों व चॉलों में रहने वालों के असल अधिकार क्या होंगे, इन तमाम बिंदुओं पर स्थिति पूरी तरह स्पष्ट होना अनिवार्य है।
चर्चा के दौरान रेलवे की जमीन पर बरसों से रह रहे रहिवासियों के संवेदनशील मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया। यह बात सामने आई कि कुछ इलाकों में रहिवासियों को घर खाली करने के लिए तीन महीने का किराया, दलाली और यात्रा खर्च के रूप में आंशिक सहायता दी गई है, लेकिन यह कोई स्थायी और भरोसेमंद समाधान नहीं है।
वक्ताओं ने चेतावनी दी कि जब तक घर, संपत्ति और पुनर्वास के अधिकार कागजों पर कानूनी रूप से तय नहीं हो जाते, तब तक कोई भी रहिवासी जल्दबाजी में किसी दस्तावेज पर हस्ताक्षर न करे। इस आंदोलन के जरिए शासन और विकासक को यह कड़ा संदेश दे दिया गया है कि जनता पारदर्शिता चाहती है और अपने कानूनी हक के बिना पीछे हटने वाली नहीं है।