बालासाहेब ठाकरे का चांदी का सिंहासन (सौजन्य-सोशल मीडिया) 
मुंबई

अखबार ने उठाया सवाल…तो बाल ठाकरे ने ऑफिस में भिजवा दिया अपना चांदी का सिंहासन! पढ़िए पूरा किस्सा

Balasaheb Thackeray Silver Chair Story: जब बालासाहेब ठाकरे ने अपना चांदी का सिंहासन अखबार के दफ्तर भिजवा दिया! पढ़ें शिर्डी मंदिर विवाद और बालासाहेब की बेबाकी का यह मशहूर किस्सा।

प्रिया जैस

Balasaheb Thackeray Chandi Ka Sinhhasan: महाराष्ट्र की राजनीति में बालासाहेब ठाकरे सिर्फ एक नेता नहीं, बल्कि अपने विचारों, तेवरों और फैसलों के लिए पहचाने जाने वाले व्यक्तित्व थे। उनकी जयंती के मौके पर उनसे जुड़ा एक ऐसा किस्सा अक्सर याद किया जाता है, जो उनकी साफगोई और प्रतीकात्मक राजनीति को बखूबी दर्शाता है।

साल 2006 की बात है। शिर्डी स्थित साईं बाबा मंदिर ट्रस्ट ने बाबा के लिए चांदी के स्थान पर सोने का सिंहासन स्थापित करने का प्रस्ताव रखा था। इस फैसले पर बालासाहेब ठाकरे ने सार्वजनिक रूप से आपत्ति जताई। उनका मानना था कि आस्था के नाम पर दिखावे और भव्यता की होड़ नहीं होनी चाहिए। उन्होंने इसे परंपरा और साधारण भावनाओं के खिलाफ बताया।

अखबार ने लिया एक्शन

बालासाहेब के इस विरोध पर एक अखबार में खबर प्रकाशित हुई, जिसमें सवाल उठाया गया कि जो नेता खुद चांदी के सिंहासन पर बैठते हैं, वे साईं बाबा के लिए सोने के सिंहासन का विरोध कैसे कर सकते हैं। खबर में इस विरोधाभास को प्रमुखता से रखा गया था।

खबर पढ़ते ही बालासाहेब ठाकरे ने कोई प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की और न ही बयान दिया। उन्होंने अपने अंदाज में जवाब देना चुना। बालासाहेब ने अपना चांदी का सिंहासन सीधे उस अखबार के संपादक के कार्यालय में भिजवा दिया। यह घटना देखते ही देखते मुंबई के राजनीतिक और मीडिया गलियारों में चर्चा का विषय बन गई। लोग इसे बालासाहेब का सटीक और तीखा जवाब मानने लगे।

बालासाहेब ने दी सफाई

कुछ समय बाद अखबार ने सम्मान के साथ वह सिंहासन बालासाहेब ठाकरे को लौटा दिया। इसके बाद बालासाहेब ने अपनी बात स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि यह सिंहासन शिवसेना की मजदूर इकाई भारतीय कामगार सेना द्वारा उन्हें उपहार में दिया गया था। उन्होंने यह भी साफ किया कि सिंहासन लकड़ी का बना है और उस पर केवल चांदी की परत चढ़ी हुई है, न कि यह ठोस चांदी का बना हुआ है।

इस पूरे घटनाक्रम ने बालासाहेब ठाकरे के व्यक्तित्व को एक बार फिर सामने रखा। ऐसा नेता जो सवालों से नहीं घबराता था, बल्कि प्रतीकों के जरिए अपनी बात मजबूती से रखता था। उनकी जयंती पर यह किस्सा आज भी याद दिलाता है कि राजनीति में शब्दों से ज्यादा असरदार कभी-कभी एक सधा हुआ कदम भी होता है।

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