Ambabai Temple Kolhapur History: महाराष्ट्र की पावन धरा पर साढ़े तीन शक्तिपीठ अत्यंत जागृत और पवित्र देवस्थान माने जाते हैं। इनमें तीन पूर्ण शक्तिपीठ कोल्हापुर की श्री महालक्ष्मी (अंबाबाई), तुलजापुर की श्री तुलजा भवानी, और माहूर की श्री रेणुका माता तथा नासिक के वणी स्थित श्री सप्तशृंगी देवी को आधा शक्तिपीठ माना जाता है। दक्षिण काशी के नाम से प्रसिद्ध ऐतिहासिक कोल्हापुर नगरी का समस्त जीवन यहां विराजमान माता अंबाबाई के इर्द-गिर्द ही केंद्रित है।
पौराणिक आख्यायिकाओं के अनुसार, प्राचीन काल में इस क्षेत्र में 'कोल्हासुर' नाम का एक अत्यंत शक्तिशाली दैत्य देवताओं और ऋषियों को प्रताड़ित करता था। तब देवी महालक्ष्मी ने अवतार लेकर उस असुर के साथ भीषण युद्ध किया और उसका संहार कर दिया।
मृत्यु से पूर्व कोल्हासुर ने देवी से प्रार्थना की कि इस पावन भूमि को उसके नाम से जाना जाए। माता ने उसकी अंतिम इच्छा स्वीकार की, जिससे इस नगर का नाम कोल्हापुर पड़ा। इसके पश्चात् देवी 'करवीर निवासिनी' के रूप में यहाँ स्थायी रूप से विराजमान हो गईं।
धार्मिक शास्त्रों के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के पार्थिव शरीर को विभक्त किया था, तब यहां सती के नेत्र (नयन/त्रिनेत्र) गिरे थे। इस कारण यह स्थान परम पवित्र शक्तिपीठ के रूप में स्थापित हुआ।
इसके अतिरिक्त, एक अन्य प्रचलित मान्यता यह भी है कि देवी महालक्ष्मी अपने स्वामी भगवान व्यंकटेश से रुष्ट होकर वैकुंठ त्याग कर करवीर क्षेत्र (कोल्हापुर नगर) आकर निवास करने लगी थीं।
ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, इस विशाल मंदिर का प्राथमिक निर्माण ईस्वी सन् 7वीं शताब्दी में चालुक्य वंश के राजा कर्णदेव ने करवाया था। कालंतर में शिलाहार राजवंश (जैसे राजा गंडरादित्य) तथा यादव राजवंश के शासकों ने इसका विस्तार किया और ईस्वी 1218 में यादव तौलम द्वारा महाद्वार का निर्माण कराया गया।
यह मंदिर हेमाड़पंथी स्थापत्य शैली में बिना चूने के, केवल काले बेसाल्ट पत्थरों के सटीक जुड़ाव से निर्मित है। मंदिर के गर्भगृह में महालक्ष्मी देवी की लगभग 3 फीट ऊंची काले पत्थर से निर्मित चतुर्भुज प्रतिमा स्थापित है।
प्रतिमा का स्वरूप: देवी के चारों हाथों में गदा (कौमोदकी), ढाल (खेटक), मातुलिंग (नींबू जैसा फल) और पानपात्र सुशोभित हैं।
विशेषता: प्रतिमा के पीछे उनका वाहन सिंह खड़ा है और सिर पर 5 फणों वाले शेषनाग का छत्र तथा मातुलिंग शिवलिंग उत्कीर्णित है। यह मंदिर पश्चिम दिशा की ओर मुख किए हुए है।
त्रिदेवी का संगम: मंदिर परिसर के केंद्रीय मंडप में त्रिदेवी विराजमान हैं मध्य में महालक्ष्मी, दक्षिण में महाकाली और उत्तर में महासरस्वती।
कोल्हापुर महालक्ष्मी मंदिर का स्थापत्य खगोलशास्त्र और वास्तुशास्त्र का एक अद्भुत चमत्कार है। वर्ष में दो बार (31 जनवरी से 2 फरवरी और 9 से 11 नवंबर) यहां ऐतिहासिक 'किरणोत्सव' सोहला पार पड़ता है।
सूर्यास्त के समय ढलते सूर्य की किरणें महाद्वार से प्रवेश कर गरुड़ मंडप और विभिन्न चौकों से होती हुई सीधे देवी की प्रतिमा तक पहुंचती हैं।
पहला दिन: सूर्य किरणें देवी के चरणों का स्पर्श करती हैं।
दूसरा दिन: किरणें प्रतिमा के मध्य भाग (छाती) तक पहुंचती हैं।
तीसरा दिन: सूर्य का प्रकाश देवी के पूरे मुखमंडल को अलौकिक रूप से प्रकाशित करता है।
मंदिर में प्रतिदिन प्रातः 4:45 बजे द्वार खोलने से लेकर काकड़ आरती, षोडशोपचार पूजा, महानैवेद्य और रात्रि 10:10 बजे शेज आरती तक की सुव्यवस्थित परंपरा निभाई जाती है। प्रत्येक शुक्रवार को रात्रि साढ़े नौ बजे परिसर में देवी की उत्सव मूर्ति की पालकी यात्रा निकाली जाती है।
नवरात्रि के दौरान यहां विशाल उत्सव मनाया जाता है। छत्रपति शिवाजी महाराज की पुत्रवधू महारानी ताराबाई ने नवरात्रि की अष्टमी पर देवी को तोप की सलामी देने की जो शिवकालीन परंपरा शुरू की थी, वह पिछले 150 वर्षों से अधिक समय से आज भी निरंतर जारी है।