कोल्हापुर में मीडिया को संबोधित करती उमा पानसरे (नीले कपड़ों में) और स्मिता पानसरे (लाल ड्रेस में), इनसेट- नष्ट की गई प्रतियां (सोर्स: सोशल मीडिया) 
कोल्हापुर

शिवाजी महाराज पर लिखी किताब को लेकर बढ़ा विवाद, प्रकाशक ने नष्ट की 45,000 प्रतियां; जानें क्या है पूरा मामला

Shivaji Kon Hota Book Controversy: गोविंद पानसरे की प्रसिद्ध पुस्तक 'शिवाजी कोण होता' को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। कॉपीराइट उल्लंघन के आरोपों के बाद प्रकाशक ने 45,000 प्रतियां नष्ट कर दी हैं।

आकाश मसने

Shivaji Kon Hota Book Copyright Controversy: महाराष्ट्र में पिछले दिनों विवादों में रही छत्रपति शिवाजी महाराज पर लिखी गई मराठी किताब 'शिवाजी कोण होता' एक बार फिर सुर्खियों में है। छत्रपति शिवाजी महाराज पर दिवंगत वामपंथी नेता और लेखक गोविंद पानसरे द्वारा लिखी गई पुस्तक को लेकर अब कॉपीराइट विवाद सामने आया है। पानसरे परिवार की ओर से कॉपीराइट उल्लंघन का आरोप लगाने के बाद पुणे के प्रकाशक ने पुस्तक की करीब 45 हजार प्रतियां नष्ट कर दीं। मामला सामने आने के बाद साहित्य और प्रकाशन जगत में चर्चा तेज हो गई है।

पानसारे परिवार ने जताई थी आपत्ति

यह विवाद तब सामने आया जब सोमवार को पानसरे परिवार ने प्रकाशक पर दिवंगत लेखक की पत्नी उमा पानसरे की अनुमति के बिना पुस्तक छापने और मूल सामग्री में बदलाव करने का आरोप लगाया। सोमवार को कोल्हापुर में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर उमा पानसारे और स्मिता पानसरे ने पुणे के पब्लिकेशन पर आरोप लगाए। परिवार का कहना था कि प्रकाशक ने कानूनी प्रक्रिया और कॉपीराइट नियमों का पालन नहीं किया। बता दें कि दिवंगत लेखक की पत्नी उमा पानसरे के पास पुस्तक के प्रकाशन का अधिकार है। शिकायत मिलने के बाद पुणे के प्रकाशक ने कार्रवाई करते हुए बड़ी संख्या में छपी प्रतियों को नष्ट करने का निर्णय लिया। यह पुस्तक 'शिवाजी कोण होता' शीर्षक से काफी चर्चित रही है और पिछले कुछ समय से राजनीतिक तथा बहस का विषय बनी हुई थी। इस के बाद प्रकाशन क्षेत्र में कॉपीराइट कानूनों और लेखकों के अधिकारों को लेकर बहस छिडी है। साहित्यिक कृति के पुनर्प्रकाशन से पहले लेखक या परिवार की अनुमति लेना आवश्यक है।

क्या बोले प्रकाशक के मुखिया?

पुणे स्थित मधुश्री पब्लिकेशन के मुखिया शरद अष्टेकर ने शिकायत के बाद अपनी गलती स्वीकार की। उन्होंने कहा कि प्रतियां छापने का निर्णय पुस्तक के ऑनलाइन संस्करण के आधार पर लिया गया था। उन्होंने इस कानूनी और संपादकीय त्रुटि बताया। शरद अष्टेकर ने बताया कि इंटरनेट पर उस पुस्तक की पीडीएफ उपलब्ध थी। हमने अच्छे इरादे से इसे छापने और कम कीमत में पाठकों तक पहुंचाने का किया था।

मधुश्री पब्लिकेशन के मालिक शरद अष्टेकर ने बताया कि इस पुस्तक की छपाई 4 दिन पहले ही शुरू हुई थी। मुझे प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से जानकारी मिली कि यह गलती हुई है। उन्होंने अपनी गलती स्वीकारते हुए कहा कि मुझे पुरानी प्रति का संदर्भ लेने चाहिए था। उन्होंने कहा कि गलती का एहसास होते ही मैंने तुरंत 45000 प्रतियां नष्ट कर दी है।

पुस्तक के लेखक गोविंद पानसरे  परिवार ने कहा कि यह मामला केवल अनुमति तक ही सीमित नहीं था, बल्कि इसमें मूल पाठ के साथ गंभीर छेड़छाड़ भी शामिल थी। उन्होंने आरोप लगाया कि किताब के कई अहम अध्याय हटा दिए गए थे और किताब के कुछ हिस्सों में बदलाव कर दिया गया था।

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