Tejaswini Desale Olympiad Success Story: शिक्षक का काम केवल कक्षा में पाठ पढ़ाना नहीं, बल्कि विद्यार्थियों की छिपी प्रतिभा को पहचान कर उसे सही दिशा देना भी है। खासकर उन बच्चों के लिए, जिन्हें बड़े अवसर आसानी से नहीं मिलते। महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर मनपा के प्रियदर्शनी विद्यालय की सहशिक्षिका एवं सीबीएसई समन्वयक तेजस्विनी धनंजय देसले ने इसी सोच को अपने कार्य का आधार बनाया। उन्होंने विद्यार्थियों को पाठ्यपुस्तकों की पढ़ाई से आगे ले जाकर राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं से जोड़ने की पहल की।
तेजस्विनी धनंजय देसले की पहल से शुरू हुआ ओलंपियाड का सफर अब छत्रपति संभाजीनगर मनपा की कई स्कूलों तक पहुंच चुका है। इसका सबसे उल्लेखनीय परिणाम तब सामने आया, जब प्रियदर्शनी विद्यालय के दो विद्यार्थियों ने ओलंपियाड परीक्षा में अखिल भारतीय शीर्ष-25 में स्थान हासिल किया। शिक्षक दिवस के अवसर पर देसले की यह पहल उन शिक्षकों के लिए प्रेरणा है, जो विद्यार्थियों को केवल पढ़ाना नहीं, बल्कि उन्हें आगे बढ़ते देखना अपना उद्देश्य मानते हैं।
प्रियदर्शनी विद्यालय की सहशिक्षिका तेजस्विनी देसले का मानना है कि विद्यार्थियों को केवल पाठ्यपुस्तक का ज्ञान देना पर्याप्त नहीं है। उन्हें यह भी सिखाना जरूरी है कि प्राप्त ज्ञान का उपयोग प्रश्नों को समझने, तर्क करने और समस्याओं का समाधान खोजने में कैसे किया जाए। इसी उद्देश्य से उन्होंने अपने विद्यालय में ओलंपियाड परीक्षाओं में विद्यार्थियों की भागीदारी शुरू कराई।
शुरुआत में विद्यार्थियों को प्रतियोगिता की परीक्षा पद्धति से परिचित कराया गया। इसके बाद नियमित अभ्यास, नमूना प्रश्न पत्रों का समाधान और अभ्यास परीक्षाओं के माध्यम से उनकी तैयारी कराई गई। इससे विद्यार्थियों में प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर झिझक कम हुई और आत्मविश्वास बढ़ा।
ओलंपियाड की तैयारी के दौरान केवल विषय आधारित जानकारी पर ध्यान नहीं दिया गया। विद्यार्थियों की तार्किक क्षमता, विश्लेषणात्मक सोच, आलोचनात्मक चिंतन और समस्या समाधान की क्षमता विकसित करने के लिए अलग-अलग प्रकार के प्रश्नों का अभ्यास कराया गया।
कम समय में अधिक प्रश्नों को सटीकता के साथ हल करने के लिए समय प्रबंधन का अभ्यास भी कराया गया। परीक्षा में होने वाली सामान्य गलतियों को चिन्हित कर विद्यार्थियों से दोबारा अभ्यास कराया गया। इससे बच्चों में अपनी कमियों को पहचानने और उन्हें सुधारने की आदत विकसित हुई।
इस पहल का सबसे बड़ा परिणाम प्रियदर्शनी विद्यालय के दो विद्यार्थियों की उपलब्धि के रूप में सामने आया। दोनों विद्यार्थियों ने ओलंपियाड परीक्षा में अखिल भारतीय शीर्ष-25 में स्थान प्राप्त किया। यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे यह साबित हुआ कि मनपा स्कूलों के विद्यार्थी भी उचित मार्गदर्शन, अभ्यास और अवसर मिलने पर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी क्षमता साबित कर सकते हैं।
दो विद्यार्थियों की सफलता का असर दूसरे बच्चों पर भी दिखाई दिया। विद्यालय के विद्यार्थियों में प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर रुचि बढ़ी और अधिक बच्चे विभिन्न विषयों की प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेने के लिए आगे आने लगे।
देसले ने इस पहल को केवल अपने विद्यालय तक सीमित नहीं रखा। उन्होंने अन्य शिक्षकों के साथ अपने अनुभव साझा किए और विद्यार्थियों को ओलंपियाड से जोड़ने के लाभों की जानकारी दी। इसके बाद मनपा की अन्य कई स्कूलों के विद्यार्थियों ने भी इन परीक्षाओं में भाग लेना शुरू किया।
आज इस पहल के माध्यम से अलग-अलग मनपा स्कूलों के बच्चे राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं का अनुभव प्राप्त कर रहे हैं। एक विद्यालय से शुरू हुआ प्रयास धीरे-धीरे व्यापक अभियान का रूप ले रहा है।
देसले के अनुसार, विद्यार्थियों की आर्थिक या पारिवारिक परिस्थितियां उनकी प्रतिभा की सीमा तय नहीं कर सकतीं। हर बच्चे में आगे बढ़ने की क्षमता होती है, लेकिन उसे सही अवसर और मार्गदर्शन मिलना जरूरी है। ओलंपियाड जैसी प्रतियोगिताएं विद्यार्थियों को कम उम्र में ही बड़े मंच से परिचित कराती हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर दूसरे विद्यार्थियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने से बच्चों का आत्मविश्वास बढ़ता है। साथ ही उनमें अनुशासन, समय प्रबंधन और चुनौती का सामना करने की क्षमता विकसित होती है। यही अनुभव आगे चलकर विभिन्न प्रवेश और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में भी उपयोगी साबित हो सकता है।
देसले का लक्ष्य विद्यार्थियों को केवल ओलंपियाड परीक्षा तक सीमित रखना नहीं है। गणित, विज्ञान, अंग्रेजी, सामान्य ज्ञान, कंप्यूटर और तार्किक क्षमता जैसे विषयों पर आधारित विभिन्न गतिविधियों के माध्यम से बच्चों की व्यापक तैयारी की जा रही है।
उनका उद्देश्य ऐसे विद्यार्थी तैयार करना है, जो केवल प्रश्नों के उत्तर याद न करें, बल्कि प्रश्न को समझें, उसके पीछे का तर्क खोजें और समाधान तक पहुंचने का प्रयास करें। उनके अनुसार, प्रतियोगिता में रैंक से अधिक महत्वपूर्ण विद्यार्थी का आत्मविश्वास और सीखने की क्षमता है।
इस पहल को आगे बढ़ाने में विद्यालय के मुख्याध्यापक संजीव सोनार का भी महत्वपूर्ण सहयोग रहा। ओलंपियाड सहित नए शैक्षणिक उपक्रम शुरू करने के लिए उन्होंने अनुमति दी और कार्य के दौरान आने वाली समस्याओं को दूर करने में सहयोग किया। विद्यालय प्रशासन के इस समर्थन से विद्यार्थियों को नए अवसर उपलब्ध कराने का प्रयास लगातार आगे बढ़ सका।
शिक्षक दिवस केवल शिक्षकों के सम्मान का दिन नहीं, बल्कि उनके योगदान को समझने का अवसर भी है। तेजस्विनी देसले की पहल बताती है कि एक शिक्षक यदि विद्यार्थियों की क्षमता पर विश्वास करे और उन्हें अवसर उपलब्ध कराने के लिए आगे आए, तो एक छोटी शुरुआत भी बड़ा बदलाव ला सकती है। प्रियदर्शनी विद्यालय के दो विद्यार्थियों का अखिल भारतीय शीर्ष-25 में पहुंचना इस प्रयास की सफलता का प्रमाण है।
छत्रपति संभाजीनगर मनपा की कई स्कूलों तक पहुंचता ओलंपियाड का यह सफर इस बात का संदेश देता है कि प्रतिभा किसी एक वर्ग या किसी एक प्रकार के विद्यालय की संपत्ति नहीं होती। सही मार्गदर्शन और अवसर मिले तो हर बच्चा राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना सकता है।