Khawadya Pahadi Sambhajinagar History: छत्रपती संभाजीनगर के वालूज एमआयडीसी क्षेत्र के तिसगाव में धुले-सोलापूर हाईवे के पास स्थित खवड्या पहाड़ी पर हाल ही में घटी एक घटना ने पूरे महाराष्ट्र को झकझोर कर रख दिया है। 19 वर्षीय युवक कुणाल घरेलू विवाद और मानसिक तनाव के कारण इस पहाड़ी के खतरनाक कगार पर पहुंच गया। बेटे को सुरक्षित वापस लाने की उम्मीद में उसके पिता मुरलीधर और मां संगीता भी वहां पहुंचे।
लेकिन होनी को कुछ और ही मंजूर था, कुणाल को बचाने और उसे पीछे खींचने के प्रयास में पिता का संतुलन बिगड़ गया और वे बेटे सहित सैकड़ों फीट गहरी खाई में जा गिरे। इस खौफनाक दृश्य को अपनी आंखों के सामने घटते देख सदमे में आई मां ने भी खाई में छलांग लगा दी। चांदगुडे परिवार की इस दर्दनाक मौत के बाद, अब हर तरफ इस डरावनी पहाड़ी के इतिहास और इसके विचित्र नाम की चर्चा हो रही है। आखिर इसे खवड्या डोंगर क्यों कहा जाता है?
छत्रपति संभाजीनगर की इस पहाड़ी का नामकरण किसी पौराणिक कथा पर नहीं, बल्कि इसकी अनूठी और डरावनी भौगोलिक संरचना पर आधारित है। इस पहाड़ी का पृष्ठभाग अत्यंत पथरीला, उबड़-खाबड़ और पूरी तरह से शुष्क है। यहां की बंजर जमीन पर केवल बेहद नुकीली कांटेदार वनस्पतियां ही उगती हैं।
इस वीरान पहाड़ी का ऊपरी और पथरीला हिस्सा दूर से देखने पर किसी विशालकाय जानवर की पीठ पर मौजूद कड़े स्केल्स यानी मराठी में खवले की तरह दिखाई देता है। इसी प्राकृतिक समानता के कारण स्थानीय लोग शुरुआती दिनों में इसे अपनी क्षेत्रीय बोलीभाषा में खवल्या पहाड़ी कहकर पुकारते थे।
समय के साथ जहां भौगोलिक स्थितियां बदलीं, वहीं भाषा के लहजे में भी बदलाव आया। जैसे-जैसे पीढ़ियां बदलती गई, स्थानीय लोगों की बोलीभाषा और उच्चारण के तौर-तरीकों में बदलाव आने लगा।
इसके परिणामस्वरूप, मुंह-दर-मुंह चलते हुए खवल्या शब्द का उच्चारण धीरे-धीरे बदलकर खवड्या हो गया। इस प्रकार, एनिमल स्केल्स जैसी दिखने वाली यह पहाड़ी इतिहास के पन्नों में और सरकारी दस्तावेजों में खवड्या डोंगर के नाम से दर्ज हो गई।