Highlights :
निर्मला सप्रे की विधायकी पर सुप्रीम कोर्ट का अहम निर्देश।
विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर को दो महीने में फैसला करने का आदेश।
उमंग सिंघार ने जून 2024 में दाखिल की थी अयोग्यता याचिका।
विवेक तन्खा ने सुप्रीम कोर्ट में कांग्रेस की ओर से रखी दलील।
निर्मला सप्रे ने कांग्रेस छोड़ने और बीजेपी जॉइन करने से किया इनकार।
अयोग्य घोषित होने पर बीना सीट पर उपचुनाव की संभावना।
Supreme Court order on Nirmala Sapre : एमपी की सियासत में विधायक निर्मला सप्रे की सदस्यता को लेकर चल रहा विवाद एक बार फिर चर्चा में है। सागर जिले की बीना विधानसभा सीट से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव जीतने वाली निर्मला सप्रे के खिलाफ दायर दल बदल याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा निर्देश दिया है। शीर्ष अदालत ने विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर को दो महीने के भीतर अयोग्यता याचिका पर फैसला करने को कहा है। इस आदेश के बाद अब निर्मला सप्रे की विधायकी का भविष्य विधानसभा अध्यक्ष के निर्णय पर निर्भर करेगा।
निर्मला सप्रे ने 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर बीना सीट से जीत दर्ज की थी। हालांकि लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान उनकी राजनीतिक गतिविधियों को लेकर विवाद शुरू हो गया। मई 2024 में वो सीएम मोहन यादव की मौजूदगी में बीजेपी के मंच पर पहुंचीं। इसके बाद उनके बीजेपी में शामिल होने की चर्चाएं तेज हो गईं। कांग्रेस ने इसे दल बदल का मामला बताते हुए उनकी विधानसभा सदस्यता समाप्त करने की मांग की।
नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने 30 जून 2024 को विधानसभा अध्यक्ष के सामने निर्मला सप्रे के खिलाफ अयोग्यता याचिका दाखिल की थी। कांग्रेस का आरोप था कि सप्रे ने पार्टी छोड़कर बीजेपी का साथ दिया और चुनाव प्रचार में भी सक्रिय रहीं। लंबे समय तक इस मामले में अंतिम निर्णय नहीं होने के बाद कांग्रेस ने न्यायालय का रुख किया।
सुप्रीम कोर्ट में कांग्रेस की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता विवेक तन्खा ने पैरवी की। उन्होंने दलील दी कि निर्मला सप्रे का मामला संविधान की दसवीं अनुसूची यानी दल बदल विरोधी कानून के तहत आता है। याचिका पर लंबे समय से फैसला नहीं होने का मुद्दा उठाते हुए उन्होंने अदालत से समयसीमा तय करने की मांग की।
4 नवंबर को चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहन की पीठ ने मामले की सुनवाई की। अदालत ने स्पष्ट किया कि दल बदल विरोधी कानून के तहत आने वाली अयोग्यता याचिकाओं का समयबद्ध तरीके से निपटारा होना चाहिए। विधानसभा का कार्यकाल बाकी होने या तत्काल जल्दबाजी की स्थिति नहीं होने को फैसला टालने का आधार नहीं बनाया जा सकता। इसके बाद विधानसभा अध्यक्ष को दो महीने के भीतर निर्णय लेने का निर्देश दिया गया।
निर्मला सप्रे इस मामले में अपना पक्ष रखते हुए कह चुकी हैं कि उन्होंने न तो कांग्रेस से इस्तीफा दिया है और न ही औपचारिक रूप से बीजेपी की सदस्यता ग्रहण की है। वो खुद को कांग्रेस का सदस्य बताती रही हैं। ऐसे में अयोग्यता याचिका पर फैसला करते समय विधानसभा अध्यक्ष को दोनों पक्षों की दलीलों और उपलब्ध दस्तावेजों पर विचार करना होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल निर्मला सप्रे की विधायकी समाप्त करने का कोई आदेश नहीं दिया है। अदालत ने केवल विधानसभा अध्यक्ष को लंबित याचिका पर तय समय में फैसला करने का निर्देश दिया है। यदि अध्यक्ष उन्हें दल बदल कानून के तहत अयोग्य घोषित करते हैं और सीट रिक्त होती है तो बीना विधानसभा में उपचुनाव की स्थिति बन सकती है। फिलहाल सभी की निगाहें विधानसभा अध्यक्ष के फैसले पर टिकी हैं।