MP Urban Development Consultants: मध्य प्रदेश के नगरीय विकास एवं आवास विभाग में बड़ी संख्या में निजी कंसल्टेंट्स की नियुक्ति को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, विभाग में सरकारी अधिकारियों की तुलना में बाहरी सलाहकारों की भूमिका लगातार बढ़ती जा रही है। दावा किया जा रहा है कि शहरों के विकास, स्मार्ट सिटी परियोजनाओं, सीवेज, जलापूर्ति, आवास और अन्य योजनाओं के संचालन में बड़ी संख्या में निजी कंसल्टेंट्स की सेवाएं ली जा रही हैं, जिन पर हर महीने करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं।
रिपोर्ट के मुताबिक, विभाग में करीब एक हजार सरकारी अधिकारी कार्यरत हैं, जबकि विभिन्न योजनाओं और परियोजनाओं के लिए 1,139 से अधिक कंसल्टेंट्स नियुक्त किए गए हैं। इन सलाहकारों पर हर महीने लगभग 8 करोड़ रुपये का खर्च बताया गया है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि जब विभाग में पर्याप्त संख्या में अधिकारी मौजूद हैं, तो इतनी बड़ी संख्या में बाहरी सलाहकारों की आवश्यकता क्यों पड़ रही है।
बताया जा रहा है कि अमृत 2.0 योजना के तहत ही 900 से अधिक कंसल्टेंट्स विभिन्न परियोजनाओं में काम कर रहे हैं। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि वर्ष 2028 तक इन सलाहकारों पर हर साल करीब 72 करोड़ रुपये खर्च होंगे। कई राष्ट्रीय और निजी कंसल्टिंग कंपनियां विभिन्न योजनाओं में तकनीकी और प्रबंधन संबंधी सेवाएं दे रही हैं।
इसी तरह प्रधानमंत्री आवास योजना में भी एक निजी कंसल्टिंग कंपनी का अनुबंध लंबे समय तक जारी रहने को लेकर सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, मार्च 2017 से दिसंबर 2025 तक कंपनी लगातार परियोजना से जुड़ी रही। इसके अलावा फायर सर्विस, सिंहस्थ जैसी बड़ी परियोजनाओं और अन्य शहरी विकास कार्यों में भी बाहरी एजेंसियों की सेवाएं ली जा रही हैं।
इधर नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार ने कहा कि मध्यप्रदेश में भाजपा सरकार ने सुशासन की जगह "कंसल्टेंट राज" कायम कर दिया है, जहां करीब 1000 अफसरों पर 1100 से अधिक सलाहकार तैनात हैं और उन पर हर महीने करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं। इतने सलाहकारों के बावजूद शहरों की सड़कें, सीवर व्यवस्था और बुनियादी सुविधाएं बदहाल हैं। जनता के टैक्स के पैसे का हिसाब देते हुए सरकार को जवाब देना चाहिए कि खर्च विकास पर हो रहा है या सलाहकारों की फौज पर।
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हालांकि, विभाग की ओर से इस संबंध में कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। सरकारी योजनाओं में निजी कंसल्टेंट्स की बढ़ती भूमिका और उन पर होने वाले खर्च को लेकर अब प्रशासनिक व्यवस्था, पारदर्शिता और जवाबदेही पर बहस तेज हो गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि विभाग में पर्याप्त अधिकारी उपलब्ध हैं तो कंसल्टेंट्स की आवश्यकता और उन पर होने वाले खर्च की समय-समय पर समीक्षा होना जरूरी है।