मध्य प्रदेश में डीजीपी की नियुक्ति को लेकर प्रशासनिक गलियारों में हलचल तेज।
30 नवंबर को रिटायर हो रहे हैं कैलाश मकवाना।
अंतिम चरण में यूपीएससी और राज्य गृह विभाग की प्रक्रिया।
Madhya Pradesh DGP Appointment: मध्य प्रदेश पुलिस मुख्यालय में नए पुलिस महानिदेशक (डीजीपी) की नियुक्ति को लेकर प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में हलचल तेज हो गई है। वर्तमान डीजीपी 30 नवंबर को सेवानिवृत्त हो रहे हैं, जिसके बाद 1 दिसंबर से राज्य को नया पुलिस प्रमुख मिलेगा।
नए डीजीपी के चयन को लेकर राज्य गृह विभाग और संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) के स्तर पर प्रक्रिया अंतिम चरण में है।
1991 और 1992 बैच के आईपीएस अधिकारी दौड़ में सबसे आगे चल रहे हैं:
वरुण कपूर: साइबर सुरक्षा और आधुनिक पुलिसिंग के क्षेत्र में विशेषज्ञता रखने वाले वरिष्ठ IPS अधिकारी। पुलिस तंत्र में तकनीक के इस्तेमाल और प्रशिक्षण अभियानों में उनका महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
उपेंद्र जैन: लंबे मैदानी और प्रशासनिक अनुभव वाले अधिकारी। राज्य के विभिन्न जिलों में कप्तानी और रेंज आईजी के रूप में कानून-व्यवस्था बनाए रखने में उनका रिकॉर्ड प्रभावी माना जाता है।
प्रज्ञा ऋचा श्रीवास्तव: राज्य की सबसे वरिष्ठ महिला आईपीएस अधिकारियों में शामिल। उन्होंने महिला सुरक्षा, विशेष पुलिस प्रतिष्ठानों और प्रशासनिक विभागों में कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभाली हैं।
डीजीपी की नियुक्ति उच्चतम न्यायालय के 'प्रकाश सिंह बनाम भारत सरकार' मामले में दिए गए दिशा-निर्देशों के तहत की जाती है:
प्रस्ताव भेजना: राज्य सरकार पात्र वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों (30 साल या उससे अधिक की सेवा पूरी कर चुके) का नाम और सर्विस रिकॉर्ड यूपीएससी को भेजती है।
यूपीएससी पैनल की बैठक: यूपीएससी, केंद्रीय गृह मंत्रालय और राज्य के प्रतिनिधियों की एक समिति सेवा रिकॉर्ड, वरिष्ठता और कार्य अनुभव के आधार पर 3 अधिकारियों का एक पैनल तैयार करती है।
अंतिम निर्णय: यूपीएससी द्वारा भेजे गए 3 नामों के पैनल में से राज्य सरकार किसी एक अधिकारी को नया डीजीपी नियुक्त करती है।
एक दिसंबर को पदभार संभालने वाले नए डीजीपी के सामने कई प्रशासनिक और रणनीतिक चुनौतियां होंगी:
कानून-व्यवस्था और साइबर अपराध- राज्य में बढ़ते साइबर क्राइम से निपटना और पुलिस बल को आधुनिक तकनीकों से लैस करना।
महिला एवं बाल सुरक्षा- राज्य में महिला सुरक्षा को और अधिक सुदृढ़ बनाना तथा संवेदनशील मामलों में त्वरित कार्रवाई सुनिश्चित करना।
नक्सल प्रभावित क्षेत्र- राज्य के सीमावर्ती और नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षा बलों के समन्वय और अभियानों को मजबूती देना।