Balaghat Remote Area Healthcare: मध्य प्रदेश सरकार ने बालाघाट में अचानक फैली बीमारी से निपटने के लिए तत्काल बहु-स्तरीय अभियान शुरू किया। प्रशासन ने DRRT सक्रिय कर बाल रोग विशेषज्ञों, महामारी वैज्ञानिकों और कीट वैज्ञानिकों की टीमें भेजीं। राष्ट्रीय स्तर की टीम ने भी प्रभावित क्षेत्रों का दौरा किया। 57 स्वास्थ्य दलों ने 50 गांवों में 43,451 लोगों की जांच की, जिनमें 6,537 का घर पर उपचार हुआ, जबकि 647 गंभीर बच्चों को अस्पताल में भर्ती कराया गया।
बिरसा में 35,827 बच्चों को खसरा-रूबेला का टीका लगाया गया। 1,63,902 परिवारों को ओआरएस-जिंक दिए गए। मलेरिया रोकथाम के तहत 8,610 घरों में छिड़काव-फॉगिंग, 26,865 जांच और 980 संक्रमितों का उपचार किया गया। 3,600 मच्छरदानियां भी बांटी गईं।
बीमारी के संकट के बीच स्वास्थ्य ढांचे और वित्तीय व्यवस्थाओं में सुधार किए गए। गर्भवती महिलाओं और बच्चों के सुरक्षित परिवहन के लिए 3.60 लाख, टीका परिवहन के लिए 3.40 लाख रुपये दिए गए। 22 उप-स्वास्थ्य केंद्रों की मरम्मत के लिए 1.93 करोड़ और उपकरणों के लिए 24 लाख रुपये स्वीकृत हुए। घुम्मुर उप स्वास्थ्य केंद्र को पीएचसी बनाने 66 लाख का प्रस्ताव भेजा गया। जिले में 54 डॉक्टर, एक मलेरिया सलाहकार और चार तकनीकी सुपरवाइजर नियुक्त किए गए। 4 नए सीडीओपी तथा 52 आंगनवाड़ी कार्यकर्ता-सहायिकाएं भी नियुक्त हुईं।
बालाघाट जिले में राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर की टीमों का आपसी समन्वय और त्वरित कार्रवाई के कारण हजारों लोगों की जानें बच गईं। टीमों ने केवल बीमारी का इलाज नहीं किया, बल्कि उसके पीछे छिपे कारणों, दूषित पेयजल, अंधविश्वास, झोलाछाप डॉक्टरों की परेशानी को भी दूर किया। डॉक्टरों की पदस्थापना, आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं की नियुक्ति और उप-स्वास्थ्य केंद्रों का सुदृढ़ीकरण ग्रामीण स्वास्थ्य की रीढ़ हैं। यह व्यवस्था लगातार मजबूत हो रही है। पिछले 23 वर्षों में बालाघाट जिले ने संस्थागत प्रसव और टीकाकरण में सुधार लाकर मातृ एवं शिशु मृत्यु दर को ऐतिहासिक रूप से कम करने में सफलता पाई है।
गौरतलब है कि इस साल जुलाई के दूसरे सप्ताह में बालाघाट जिले के बिरसा विकासखंड के बोंदारी, कुंडेकसा, कोरका, डंडेकसा और सोनगुड्डा उप-स्वास्थ्य केंद्र क्षेत्र के आसपास के गांवों में बच्चों में अचानक बुखार और दाने होने की शिकायतें मिलीं। इसकी जानकारी लगते ही मेडिकल टीमों ने तत्काल वहां जाने की तैयारी की। टीमें दुर्गम स्थानों में भारी बारिश के बावजूद वहां पहुंचीं, जाना पहुंचना आसान नहीं था। यहां पहुंचकर टीमों ने बच्चों का उपचार शुरू किया।
यदि हम पिछले दो दशकों पर नजर डालें, तो बालाघाट जिले ने स्वास्थ्य के क्षेत्र में असाधारण प्रगति की है। वर्ष 2003 और वर्ष 2026 के आंकड़ों की तुलना इस बात की गवाह है। संस्थागत प्रसव : जहां वर्ष 2003 में यह केवल 21.50% था, वहीं वर्ष 2026 में बढ़कर 92.10% हो गया। सुरक्षित प्रसव : यह आंकड़ा 41.50% (2003) से बढ़कर 94.10% (2026) हो गया है। पूर्ण टीकाकरण : बच्चों का पूर्ण टीकाकरण 47.50% से बढ़कर 92.70% तक पहुंच गया है।
मातृ मृत्यु- वर्ष 2003 में मातृ मृत्यु के लगभग 176 मामले थे, जो 2026 में घटकर 60 रह गए। इससे प्रतिवर्ष 116 महिलाओं की जान बचाई जा रही है। विगत 23 वर्षों में लगभग 2650 माताओं की जान बचाई गई। शिशु मृत्यु- वर्ष 2003 में शिशु मृत्यु के मामले लगभग 3805 थे, जो घटकर 1560 हो गए। इससे प्रतिवर्ष 2245 शिशुओं को नया जीवन मिल रहा है। विगत 23 वर्षों में लगभग 51,600 शिशुओं की जान बचाई गई।