World Lion Day: शेर को जंगल का राजा कहा जाता है, शेर को मेक इन इंडिया की पहचान के तौर पर भी अपनाया गया, लेकिन भारत के लिए एशियाई शेर सिर्फ शक्ति प्रदर्शन और शान का प्रतीक नहीं हैं। यह देश की वन्यजीव विरासत और सफल संरक्षण की एक बड़ी कहानी भी हैं। कभी विलुप्ति के कगार तक पहुंच चुके एशियाई शेर आज गुजरात के गिर में मजबूती से अपनी मौजूदगी दर्ज कर रहे हैं।
2025 में हुई 16वीं एशियाई शेर गणना में गुजरात के पूरे लायन लैंडस्केप शेरों की संख्या 891 दर्ज की गई। 2020 में इनकी संख्या 674 थी। यानी पांच साल में आबादी में करीब 32.2 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है, लेकिन मामला केवल बढ़ती संख्या की नहीं है। जैसे-जैसे शेरों का इलाका बढ़ रहा है, वैसे-वैसे उनके आवास, वन्यजीव गलियारों, बीमारियों और मानव-वन्यजीव संघर्ष से जुड़ी चुनौतियां भी सामने आ रही हैं।
एशियाई शेर को वैज्ञानिक रूप से Panthera leo से संबंधित माना जाता है। लंबे समय तक इसे Panthera leo persica के नाम से अलग उपप्रजाति के रूप में जाना जाता रहा है। माना जाता है कि आधुनिक आनुवंशिक अध्ययनों ने शेरों के वर्गीकरण को और जटिल बनाया है, लेकिन भारत में पाए जाने वाले शेरों की पहचान उनकी विशेष शारीरिक विशेषताओं से आसानी से की जा सकती है।
नर एशियाई शेरों की अयाल अफ्रीकी शेरों की तुलना में अपेक्षाकृत छोटी और कम घनी होती है। इससे उनके कान भी अधिक आसानी से दिखाई देते हैं। पेट के हिस्से में त्वचा की एक खास लंबवत तह भी एशियाई शेरों की पहचान में मदद करती है।
आज एशियाई शेरों का प्राकृतिक आवास गुजरात के गिर और उसके आसपास के लैंडस्केप तक सीमित है, लेकिन इतिहास में इनका विस्तार इससे कहीं ज्यादा बड़ा था। एक समय एशियाई शेर पश्चिम एशिया से लेकर भारतीय उपमहाद्वीप तक अलग-अलग इलाकों में पाए जाते थे। शहरीकरण और शिकार के बढ़ने के साथ इनकी संख्या और भौगोलिक सीमा लगातार घटती गई। 20वीं सदी की शुरुआत तक गिर में इनकी संख्या 50 से भी कम रह गई थी।
जब किसी क्षेत्र में किसी वन्यजीव की आबादी बढ़ती है, तो भोजन और रहने की जगह की जरूरत भी बढ़ती है। गिर लैंडस्केप में शेरों की संख्या बढ़ने के साथ युवा और घूमने वाले शेर नए इलाकों की ओर बढ़े हैं। 2025 की गणना में जंगल के साथ-साथ कृषि भूमि, घासभूमि, नदी किनारे, तटीय इलाकों और मानव बस्तियों के आसपास भी शेरों की मौजूदगी दर्ज की गई।
शेरों के नए क्षेत्रों में फैलने के लिए सिर्फ जंगल पर्याप्त नहीं हैं। अलग-अलग आवासों के बीच सुरक्षित रास्ते भी जरूरी हैं। गुजरात के लैंडस्केप में जंगल, घासभूमि, कृषि क्षेत्र, नदी किनारे और दूसरे प्राकृतिक क्षेत्र शेरों की आवाजाही में भूमिका निभाते हैं। अगर सड़क, निर्माण या दूसरे विकास कार्य इन गलियारों को तोड़ते हैं, तो शेरों की आवाजाही प्रभावित हो सकती है और इंसानों के साथ टकराव बढ़ सकता है।
इसलिए आज शेर संरक्षण का मतलब केवल गिर नेशनल पार्क की सुरक्षा करना नहीं रह गया है। पूरे लैंडस्केप को सुरक्षित रखना उतना ही जरूरी है।
एशियाई शेर मुख्य रूप से मांसाहारी होते हैं। गिर के जंगल में उन्हें चीतल, सांभर, नीलगाय, जंगली सूअर और दूसरे शिकार मिलते हैं।
एशियाई शेरों की संख्या बढ़ना निश्चित रूप से बड़ी उपलब्धि है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि अब इस प्रजाति पर कोई खतरा नहीं है। सबसे बड़ी चिंता यह है कि दुनिया की जंगली एशियाई शेर आबादी अभी भी एक ही बड़े भौगोलिक लैंडस्केप से जुड़ी हुई है। अगर किसी गंभीर बीमारी, प्राकृतिक आपदा या बड़े पर्यावरणीय संकट का असर इस क्षेत्र पर पड़ता है, तो इसका सीधा असर शेरों पर भी पड़ेगा।
वन्यजीव संरक्षण में बीमारी का खतरा किसी भी बड़ी आबादी के लिए गंभीर हो सकता है। 2018 में गुजरात के शेरों में Canine Distemper Virus (CDV) का प्रकोप सामने आया था, जिसमें 20 से अधिक शेरों की मौत हुई थी। इस घटना ने यह सवाल फिर खड़ा किया कि एक ही भौगोलिक क्षेत्र में सीमित जंगली आबादी कितनी संवेदनशील हो सकती है।
वन्यजीव विशेषज्ञ लंबे समय से एशियाई शेरों के लिए दूसरी स्वतंत्र जंगली आबादी स्थापित करने की जरूरत पर जोर देते रहे हैं। इसका मकसद सिर्फ शेरों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि पूरी प्रजाति के जोखिम को कम करना है। अगर एक आबादी बीमारी, जंगल की आग, बाढ़ या किसी दूसरी बड़ी आपदा से प्रभावित होती है, तो दूसरी जगह मौजूद स्वतंत्र आबादी प्रजाति के अस्तित्व के लिए सुरक्षा कवच का काम कर सकती है।
एशियाई शेरों की वापसी कई दशकों के लगातार संरक्षण प्रयासों का परिणाम है। संरक्षित क्षेत्रों का विकास, शिकार पर नियंत्रण, शिकार प्रजातियों की संख्या में सुधार, वन प्रशासन और स्थानीय समुदायों की भागीदारी ने इसमें अहम भूमिका निभाई।
हर साल 10 अगस्त को विश्व शेर दिवस मनाया जाता है। यह दिन दुनिया के शेरों के संरक्षण और उनके सामने मौजूद खतरों के प्रति जागरूकता बढ़ाने का मौका है। भारत के लिए यह दिन इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि एशियाई शेरों की जंगली आबादी देश की एक बड़ी वन्यजीव संरक्षण सफलता की कहानी है।