Xi Jinping India Visit: भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (NSA) अजीत डोभाल इस समय चीन दौरे पर गए हैं। उनका यह दौरा ऐसे समय पर हो रहा है जब भारत अगले महीने (12-13 सितंबर) ब्रिक्स नेताओं के शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने वाला है। ऐसे में चर्चा तेज हो गई है कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग सात साल बाद भारत दौरे पर आएंगे। जिनपिंग के भारत दौरे को लेकर दावा किया जा रहा है कि उनके साथ 400 अधिकारियों का एक प्रतिनिधि समूह भी सम्मेलन में शामिल होगा।
एक तरह जहां जिनपिंग के दौरे को लेकर भारत में अलग-अलग दावे किए जा रहे हैं। वहीं चीन में इसे लेकर कोई भी हलचल नजर नहीं आ रही है। चीन की सरकार ने भी अभी तक इस पर मोहर नहीं लगाई है कि जिनपिंग अगले महीने भारत जाएंगे या नहीं। जबकि उन्हें इस शिखर सम्मेलन में शामिल होने का न्योता प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन में शामिल होने के दौरान दिया था। ऐसे में सवाल उठने लगे हैं कि क्या जिनपिंग अपना भारत दौरा टाल देंगे? चीन भारत के साथ मंच साझा करने से क्यों बच रहा है? और क्या चीन इससे पहले भी ऐसा कर चुका है?
यह पहली बार नहीं है जब चीन ने शी जिनपिंग के किसी वैश्विक सम्मेलन में शामिल होने को लेकर ऐसा रुख अपनाया हो। 2023 में भारत ने जी-20 शिखर सम्मेलन की मेजबानी की थी। उस समय भी दावा किया जा रहा था कि जिनपिंग इसमें शामिल होने के लिए भारत आएंगे। लेकिन चीन ने सम्मेलन शुरू होने के कुछ घंटे पहले ऐलान किया कि जिनपिंग सम्मेलन में शामिल नहीं होंगे। इसके पीछे राष्ट्रपति के व्यस्त शेड्यूल को कारण बताया गया था। तब कई ग्लोबल मीडिया आउटलेट्स ने इसे भारत के लिए झटका माना था। क्योंकि 2012 में राष्ट्रपति पद संभालने के बाद यह पहली बार था, जब जिनपिंग जी-20 शिखर सम्मेलन में शामिल नहीं हुए थे।
इसके अलावा 2025 में ब्राजील के रियो डी जेनेरो में BRICS शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ था। तब जिनपिंग ने इससे भी दूरी बनाई थी। उस समय भी जिनपिंग के व्यस्त शेड्यूल को वजह बताया था। लेकिन विशेषज्ञों ने इसके पीछे भारत को असल वजह माना था। माना गया कि ब्राजील के अपने सरकारी दौरे के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गेस्ट ऑफ ऑनर होना शी और चीन को असहज कर सकता था। हालांकि इसके भारत और चीन के खराब रिश्तों को भी माना गया।
भारत ने इस महीने की शुरुआत में अरुणाचल प्रदेश में 27 स्थानों के मानकीकरण की घोषणा की थी। इसे लेकर चीन ने कड़ी आपत्ति जताई थी। शंघाई इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनेशनल स्टडीज (SIIS) के वरिष्ठ अधिकारी और चीन के प्रमुख विशेषज्ञ माने जाने वाले लियू जोंगयी ने इसे इस बात का सबूत बताया कि हाल ही में दोनों देशों के रिश्तों को बेहतर बनाने की कोशिशों के बावजूद नई दिल्ली का रुख मजबूत बना हुआ है।
वहीं चीन के सरकारी अखबार चाइना डेली ने अपने संपादकीय में कड़े शब्दों में भारत को चेतावनी दी थी। अखबार ने लिखा कि चीन और भारत सीमा का इतिहास राजनीतिक दिखावे के बजाय सावधानी बरतने की मांग करता है। वहीं एक प्रसिद्ध ब्लॉगर ने लिखा कि, आने वाली BRICS मीटिंग से ठीक पहले चीन पर हमला करके, क्या मोदी सोचते हैं कि पहले एक्शन लेकर, उनका पलड़ा भारी है?
ब्लूमबर्ग ने शी जिनपिंग द्वारा पीएम मोदी से दूरी बनाने को लेकर कहा कि, हालांकि हाल के महीनों में चीन-भारत के रिश्ते कुछ बेहतर हुए हैं, लेकिन माओ के बाद सबसे ताकतवर चीनी नेता शी जिनपिंग के लिए यह शर्मनाक हो सकता है, अगर कोई दूसरा वैश्विक नेता उन पर हावी हो जाए।
ब्लूमबर्ग के मुताबिक, जिनपिंग नहीं चाहते कि वो किसी भी वैश्विक मंच पर प्रधानमंंत्री नरेंद्र मोदी या किसी अन्य नेता से कमजोर नजर आएं। यही वजह है कि 2020 में वास्तविक नियंत्रण रेखा (LAC) पर दोनों देशों के सैनिकों के बीच टकराव के बाद खराब हुए रिश्तों के बाद से जिनपिंग पीएम मोदी के साथ मंच साझा करने से बचते आ रहे हैं।
हालांकि, दोनों नेताओं ने 2025 में चीन के तियानजिन में आयोजित हुए शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के 25वें शिखर सम्मेलन में मंच साझा किया था। पहले पीएम मोदी इसमें नहीं शामिल होने वाले थे, तब जिनपिंग ने भारतीय राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिखकर दोनों देशों के ऐतिहासिक रिश्तों और भविष्य का हवाला देते हुए पीएम मोदी को मानने की अपील की थी। इसके बाद राष्ट्रपति मुर्मू ने पीएम मोदी से बात की और उन्हें चीन जाने के लिए मनाया था।
2025 में आयोजित हुआ SCO शिखर सम्मेलन चीन के लिए कई मायनों में अहम था। क्योंकि उस समय अमेरिका ने चीन और भारत समेत कई देशों पर टैरिफ लगाया था। इस दौरान चीन और अमेरिका के रिश्ते काफी तनावपूर्ण हो गए थे। ऐसे में चीन चाहता था कि वह SCO में शामिल हर बड़े नेता को एक मंच पर लाकर अमेरिका को कड़ा संदेश दे। ऐसे में अगर भारत जैसे बड़े देश का सबसे बड़ा नेता ही शिखर सम्मेलन में शामिल नहीं होता, तो यह अमेरिका के सामने चीन की बड़ी हार होती। पीएम मोदी दौरे के बाद दोनों देशों के रिश्तों में भी कई सकारात्मक बदलाव आए थे। इसके बाद से ही माना जा रहा था कि शी जिनपिंग 2026 में BRICS शिखर सम्मेलन होंगे।
विशेषज्ञों का मानना है कि शी जिनपिंग के भारत आने या नहीं आने के फैसले को लेकर चीनी सस्पेंस और ड्रामा शायद उनकी रणनीति का हिस्सा हो। चाइना ग्लोबल साउथ प्रोजेक्ट से जुड़े डेरेक ग्रॉसमैन मानते हैं कि, शायद चीन चाहता है कि भारत पहले कई मुद्दों पर एक अच्छी दिशा में आगे बढ़े, जिसमें चीनी निवेश और व्यापार पर भारतीय पाबंदियों में और ढील, वीजा और डायरेक्ट कनेक्टिविटी, तिब्बत और ताइवान के मुद्दे शामिल हैं।
दूसरी ओर, कुछ अन्य विशेषज्ञों का मत है कि भले ही जिंगपिंग ने ग्लोबल पावर बैलेंस को बदलने के लिए BRICS को अपनी कोशिश का केंद्र बनाया है, लेकिन एक बड़ा संदेश भेजने के चक्कर में चूक भी हो सकती है। चीन के रुख को देखकर समझ आता है कि रिश्तों में नरमी के समय भी, भारत के अरुणाचल कदम को वह राजनीतिक दिखावे के तौर ही देख रहा है। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि चीनी राष्ट्रपति BRICS शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए भारत आते हैं या 2023 और 2025 की तरह दूरी बनाकर रखते हैं।