सोनम वांगचुक, कपिल सिब्बल 
देश

जो देश के लिए 30 अवार्ड जीता वो अब अपराधी...सुप्रीम कोर्ट में बोले सोनम वांगचुक, कोर्ट ने क्या कहा?

Sonam Wangchuk News: कपिल सिब्बल ने कोर्ट में कहा कि वांगचुक की शांति की अपील वाले भाषण को गैर-कानूनी रूप से दबा दिया गया। कोर्ट अब इस मामले में अगली सुनवाई 12 जनवरी को करेगी।

अर्पित शुक्ला

Supreme Court on Sonam Wangchuk Case: सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को जेल में बंद लद्दाख के क्लाइमेट और सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक की याचिका पर सुनवाई हुई। वांगचुक की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल अदालत में पेश हुए। सुनवाई के दौरान सोनम वांगचुक ने अपने वकील के माध्यम से शीर्ष अदालत को बताया कि शांति की अपील वाली उनकी स्पीच को हिरासत में लेने वाली अथॉरिटी ने गैरकानूनी तरीके से दबा दिया। उन्होंने यह भी कहा कि उनका पूरा आंदोलन पूरी तरह शांतिपूर्ण था।

सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक, जिन्होंने हमेशा हिंसा के खिलाफ आवाज उठाई और राष्ट्र निर्माण के लिए 30 पुरस्कार हासिल किए हैं, उन्हें अब एक अपराधी की तरह पेश किया जा रहा है। सिब्बल ने जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस प्रसन्ना वराले की अध्यक्षता वाली दो जजों की पीठ को बताया कि सोनम वांगचुक को अंग्रेजी में साफ तौर पर यह कहते हुए सुना जा सकता है कि आंदोलन हिंसा, पत्थरों या तीरों से नहीं, बल्कि शांतिपूर्ण तरीकों से होगा। यह बात वीडियो में स्पष्ट रूप से देखी और सुनी जा सकती है।

शांतिपूर्ण बदलाव की बात

पूरे आंदोलन में सोनम वांगचुक की बेगुनाही पर जोर देते हुए सिब्बल ने कहा कि उनके मुवक्किल ने बिना किसी को परेशान किए बदलाव लाने के लिए शांतिपूर्ण क्रांति की बात की थी। उन्होंने तर्क दिया कि वांगचुक ने न तो राज्य की सुरक्षा को खतरे में डाला, न हिंसा फैलाई और न ही नुकसान पहुंचाने वाली गतिविधियों को आगे बढ़ाने का कोई इरादा दिखाया। इसके उलट, वह हमेशा राष्ट्रीय एकता और अखंडता के प्रति प्रतिबद्ध रहे हैं।

डिटेंशन ऑर्डर के उलट दलील

सिब्बल ने कहा कि उनके भाषण को किसी भी तरह से ‘राज्य की सुरक्षा के लिए खतरा’ नहीं माना जा सकता। उन्होंने दलील दी कि भाषण का लहजा न तो हिंसा भड़काने वाला है और न ही किसी अवैध गतिविधि को जारी रखने की बात करता है, बल्कि उसे समाप्त करने पर जोर देता है। सिब्बल ने कहा कि भाषण का स्वर देश की एकता और अखंडता के अनुरूप है, जो डिटेंशन ऑर्डर में कही गई बातों से बिल्कुल विपरीत है।

28 दिन बाद बताए गए हिरासत के आधार

सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि कानून साफ तौर पर कहता है कि अगर हिरासत के सभी आधार समय पर नहीं बताए जाते, तो हिरासत का आदेश रद्द किया जा सकता है। उन्होंने बताया कि सोनम वांगचुक को हिरासत में लेने के आधार 28 दिन बाद बताए गए, जो कानूनी समयसीमा का स्पष्ट उल्लंघन है। 29 सितंबर को उन्हें डिटेंशन ऑर्डर और अधूरे आधार दिए गए थे। घटना से जुड़े चार वीडियो उस दिन उपलब्ध नहीं कराए गए। पुलिस ने सिर्फ वीडियो के लिंक दिए।

उन्होंने आगे कहा कि 5 अक्टूबर को एक लैपटॉप दिया गया, लेकिन 29 सितंबर को दी गई पेनड्राइव में वे चारों वीडियो मौजूद नहीं थे। कानून के मुताबिक, जिन दस्तावेजों के आधार पर हिरासत ली गई है, यदि वे उपलब्ध नहीं कराए जाते, तो डिटेंशन ऑर्डर स्वतः निरस्त हो जाता है। सुप्रीम कोर्ट अपने कई फैसलों में यह बात कह चुका है।

26 सितंबर 2025 को हुई गिरफ्तारी

सोनम वांगचुक को 26 सितंबर 2025 को लद्दाख के लेह में राज्य का दर्जा और संविधान की छठी अनुसूची के तहत सुरक्षा की मांग को लेकर हुए विरोध प्रदर्शनों के दौरान हिंसा भड़कने के बाद गिरफ्तार किया गया था। उन पर कड़े राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत मामला दर्ज किया गया है। उनकी पत्नी और शिक्षिका गीतांजलि आंगमो ने उनकी हिरासत को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।

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