सांकेतिक तस्वीर (Image- Social Media) 
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Explainer: यूरेनियम आयात का झंझट खत्म! कल्पक्कम का PFBR भारत को बनाएगा परमाणु महाशक्ति? US-चीन भी रह गए पीछे

Kalpakkam PFBR: भारत ने रचा इतिहास! कल्पक्कम का स्वदेशी फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) 'क्रिटिकलिटी' चरण में पहुँचा। थोरियम के उपयोग और ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में यह PM मोदी का "निर्णायक कदम" है।

अर्पित शुक्ला

India 3 Stage Nuclear Program Explained: भारत ने अपने परमाणु कार्यक्रम में एक अहम उपलब्धि हासिल की है। कल्पक्कम स्थित 500 मेगावॉट का प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) अब ‘क्रिटिकलिटी’ की अवस्था तक पहुंच गया है। इसका अर्थ है कि रिएक्टर के भीतर नियंत्रित परमाणु श्रृंखला अभिक्रिया सफलतापूर्वक शुरू हो चुकी है। यह उपलब्धि न सिर्फ तकनीकी दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा और भविष्य की परमाणु रणनीति के लिए भी बेहद अहम मानी जा रही है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे भारत के परमाणु कार्यक्रम के दूसरे चरण की दिशा में एक “निर्णायक कदम” बताया। उन्होंने कहा कि यह पूरी तरह स्वदेशी तकनीक से विकसित रिएक्टर देश की वैज्ञानिक और इंजीनियरिंग क्षमताओं का प्रमाण है। साथ ही, यह भारत को अपने विशाल थोरियम भंडार के उपयोग की दिशा में आगे बढ़ाएगा, जो तीसरे चरण का आधार है।

क्या है ‘क्रिटिकलिटी’ और इसके मायने?

‘क्रिटिकलिटी’ परमाणु इंजीनियरिंग का एक महत्वपूर्ण चरण है, जिसमें रिएक्टर के भीतर विखंडन प्रक्रिया स्वतः जारी रहती है और इसे बनाए रखने के लिए बाहरी ऊर्जा की आवश्यकता नहीं होती। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि रिएक्टर तुरंत पूर्ण क्षमता से बिजली उत्पादन शुरू कर देगा। इसके बाद चरणबद्ध तरीके से पावर बढ़ाई जाती है और हर स्तर पर सुरक्षा व प्रदर्शन की गहन जांच की जाती है।

फास्ट ब्रीडर रिएक्टर की कार्यप्रणाली

PFBR की खासियत यह है कि यह पारंपरिक रिएक्टरों से अलग काम करता है। जहां सामान्य रिएक्टर जितना ईंधन उपयोग करते हैं, उतना ही खत्म भी कर देते हैं, वहीं फास्ट ब्रीडर रिएक्टर उपयोग से अधिक नया ईंधन तैयार कर सकता है। इसी वजह से इसे ‘ब्रीडर’ कहा जाता है।

फास्ट ब्रीडर रिएक्टर की कार्यप्रणाली (Image- Social Media)

यह रिएक्टर मिक्स्ड ऑक्साइड (MOX) ईंधन पर चलता है, जिसमें यूरेनियम-238 और प्लूटोनियम-239 का मिश्रण होता है। साथ ही इसमें लिक्विड सोडियम को कूलेंट के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, जो उच्च तापमान पर भी प्रभावी रहता है। इस तकनीक के जरिए ‘फर्टाइल’ सामग्री को ‘फिसाइल’ ईंधन में बदला जाता है, जो भारत के दीर्घकालिक परमाणु कार्यक्रम की नींव है।

स्वदेशी तकनीक और निर्माण प्रक्रिया

इसका डिजाइन इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र ने तैयार किया है, जबकि निर्माण भारतीय नाभिकीय विद्युत निगम लिमिटेड ने किया है। दोनों ही संस्थाएं परमाणु ऊर्जा विभाग के अंतर्गत आती हैं। इस परियोजना में 200 से अधिक भारतीय कंपनियों की भागीदारी रही, जिससे यह पूरी तरह स्वदेशी प्रयास बन गया।

इस परियोजना(PFBR) की शुरुआत 2004 में हुई थी, लेकिन तकनीकी चुनौतियों और देरी के कारण इसकी लागत 5,600 करोड़ रुपये से बढ़कर करीब 7,600 करोड़ रुपये तक पहुंच गई। बीच में ईंधन ट्रांसफर सिस्टम में आई समस्याओं के कारण डिजाइन में बदलाव भी करने पड़े।

इंदिरा गांधी परमाणु अनुसंधान केंद्र (Image- Social Media)

भारत की त्रि-चरणीय परमाणु रणनीति

भारत का परमाणु कार्यक्रम तीन चरणों में विभाजित है, जिसमें PFBR की भूमिका महत्वपूर्ण है। पहले चरण में PHWR रिएक्टर प्राकृतिक यूरेनियम से प्लूटोनियम तैयार करते हैं। दूसरे चरण में, जिसमें PFBR शामिल है, इसी प्लूटोनियम से अधिक फिसाइल सामग्री तैयार की जाती है। तीसरे चरण में थोरियम आधारित रिएक्टर विकसित किए जाते हैं, जो यूरेनियम-233 उत्पन्न करते हैं और दीर्घकालिक ईंधन चक्र की नींव रखते हैं।

भारत के पास दुनिया के बड़े थोरियम भंडारों में से एक है, लेकिन इसे सीधे उपयोग में नहीं लाया जा सकता। इसे पहले यूरेनियम-233 में बदलना होता है। PFBR इस प्रक्रिया की एक महत्वपूर्ण कड़ी है और इसी कारण इसे ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में ‘गेम चेंजर’ माना जा रहा है।

भारत की त्रि-चरणीय परमाणु रणनीति (Image- AI)

आयात पर निर्भरता में कमी

इस उपलब्धि से भारत की आयातित यूरेनियम पर निर्भरता भी कम हो सकती है। फिलहाल देश को अपने परमाणु कार्यक्रम के लिए काफी मात्रा में यूरेनियम आयात करना पड़ता है, लेकिन फास्ट ब्रीडर और थोरियम तकनीक के जरिए घरेलू संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव होगा।

सुरक्षा मानक और तकनीकी विशेषताएं

तकनीकी रूप से PFBR में कई उन्नत सुरक्षा फीचर्स मौजूद हैं, जैसे ‘नेगेटिव वॉइड कोएफिशिएंट’, जो तापमान बढ़ने या कूलेंट कम होने की स्थिति में प्रतिक्रिया को स्वतः धीमा कर देता है। इससे सुरक्षा का स्तर बढ़ता है। लिक्विड सोडियम कूलिंग सिस्टम इसे उच्च तापमान पर भी सुरक्षित और कुशल बनाए रखता है।

क्रिटिकलिटी हासिल करने से पहले वैज्ञानिकों ने कई चरणों में परीक्षण किए, जिनमें फ्यूल लोडिंग और लो-पावर परीक्षण शामिल थे। हर चरण में नियामक संस्थाओं से अनुमति लेकर सुरक्षा मानकों का पालन सुनिश्चित किया गया। अब आने वाले महीनों में रिएक्टर की क्षमता धीरे-धीरे बढ़ाई जाएगी और सभी सिस्टम्स की विस्तृत जांच होगी।

सुरक्षा मानक और तकनीकी विशेषताएं (Image- AI)

वैश्विक पटल पर भारत की स्थिति

यह परियोजना इसलिए भी खास है क्योंकि दुनिया के बहुत कम देशों के पास इस स्तर की फास्ट ब्रीडर तकनीक है। रूस इस क्षेत्र में अग्रणी रहा है, और अब भारत भी इस चुनिंदा समूह में शामिल हो गया है। इससे भारत की वैश्विक तकनीकी और वैज्ञानिक स्थिति और मजबूत होगी।

सरकार की योजना है कि भविष्य में कल्पक्कम में और फास्ट ब्रीडर रिएक्टर विकसित किए जाएं, जिससे इस तकनीक का विस्तार हो सके। इससे बिजली उत्पादन बढ़ेगा और एक स्थायी, स्वदेशी परमाणु ईंधन चक्र विकसित करने में मदद मिलेगी।

स्वदेशी परमाणु ईंधन चक्र विकसित करने की योजना (Imaege- Scial Media)

ऊर्जा की बढ़ती मांग और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों के बीच परमाणु ऊर्जा को एक स्वच्छ और भरोसेमंद विकल्प माना जा रहा है। कोयला और तेल जैसे पारंपरिक स्रोत सीमित हैं, जबकि सौर और पवन ऊर्जा निरंतरता की चुनौती झेलते हैं। ऐसे में परमाणु ऊर्जा एक स्थिर और दीर्घकालिक समाधान के रूप में उभर रही है।

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