दिल्ली यूनिवर्सिटी के पाठयक्रम में बदलाव (फोटो- सोशल मीडिया) 
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DU ने सिलेबस से हिंदू राष्ट्रवाद, इस्लाम का उदय और आदिवासी संघर्ष के चैप्टर हटाए

दिल्ली यूनिवर्सिटी ने अपने पाठयक्रम से हिन्दू राष्ट्रवाद, बंगाल में इस्लाम का उदय व आदिवासी संघर्षों जैसे चैप्टर को हटा दिया है, विश्वविद्यालय के द्वारा इन बदलावों को मामूली बताकर हटाया गया है।

सौरभ शर्मा

दिल्ली यूनिवर्सिटी ने पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स के सेलेबस में बड़ा बदलाव करते हुए कई विवादित और आलोचनात्मक विषयों को अब हटा दिया है। इनमें हिंदू राष्ट्रवाद, बंगाल में इस्लाम का उदय, धर्मांतरण, और आदिवासी संघर्ष जैसे संवेदनशील मुद्दे शामिल हैं। डीयू की अकादमिक काउंसिल ने इन विषयों को राजनीतिक विज्ञान और इतिहास विभाग के कोर्स से हटाने का फैसला किया है, जिसे विश्वविद्यालय प्रशासन ने इन बदलावों को मामूल बदलाव बताया है।

इन बदलावों में खासतौर पर वे पुस्तकें और निबंध निशाने पर रहे हैं, जिनमें दक्षिणपंथी विचारधाराओं, हिंदू राष्ट्रवाद, या धार्मिक-सांस्कृतिक बदलावों पर आलोचनात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया था। काउंसिल के इस फैसले को लेकर शिक्षाविदों और छात्रों में अलग-अलग प्रतिक्रिया देखने को मिल रही है।

किन किताबों और विषयों को हटाया गया

राजनीतिक विज्ञान विभाग के पाठ्यक्रम से क्रिस्टोफ जैफरलॉट की 'Hindu Nationalism: A Reader' हटाई गई है, जिसमें सावरकर और गोलवलकर जैसे विचारकों की आलोचना की गई थी। इसी तरह अमिता बाविस्कर की 'In the Belly of the River', जो नर्मदा घाटी के आदिवासी आंदोलनों पर आधारित है, को भी हटा दिया गया है।

इतिहास विभाग से फिलिप बी. वैगनर का 'Sultan Among Hindu Kings' और रिचर्ड ईटन की 'The Rise of Islam and the Bengal Frontier' जैसी कृतियों को हटाया गया है, जिनमें धर्मांतरण और इस्लामीकरण जैसे विषयों की वैकल्पिक व्याख्याएं दी गई थीं।

पाकिस्तानी और चीनी अध्ययन भी हटे

जून महीने में ही डीयू ने ग्लोबल पॉलिटिक्स के एमए कोर्स से पाकिस्तान, चीन और इस्लाम से संबंधित पूरा पेपर हटा दिया था। अधिकारियों के अनुसार, इन विषयों की जगह समकालीन वैश्विक मुद्दों को प्राथमिकता दी जा रही है। डीयू प्रशासन के अनुसार, यह कदम सेलेबस को प्रासंगिक और आज के अनुसार बनाने के लिए उठाया गया है, जबकि कई शिक्षकों और छात्रों का मानना है कि इससे अकादमिक स्वतंत्रता और वैचारिक विविधता पर असर पड़ेगा।

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क्या बोले शिक्षक और छात्र

कुछ प्रोफेसरों का मानना है कि इस तरह के विषय छात्रों में आलोचनात्मक सोच विकसित करते हैं और इन्हें हटाना शैक्षणिक दृष्टिकोण से नुकसानदेह हो सकता है। वहीं, विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) के अनुरूप पाठ्यक्रम को अपडेट किया जा रहा है और छात्रों की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए निर्णय लिया गया है।

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