कूंरा को अब जाना जाएगा ऐतिहासिक नाम कुंवरगढ़।
साय सरकार ने पहचान दिलाने की बड़ी पहल।
कुंवरगढ़ में 100 से अधिक तालाब।
संरक्षण के अभाव में लगभग 50 तालाब ही बचे।
Raipur Kunwargarh Untold Story: छत्तीसगढ़ के नक्शे पर एक ऐसा गांव भी है जिसकी पहचान सिर्फ उसकी आबादी या भौगोलिक सीमाओं से नहीं बल्कि तालाबों, प्राचीन मंदिरों, दुर्लभ प्रतिमा और सांप्रदायिक सौहार्द की अनूठी मिसाल से जुड़ी है। रायपुर जिले के धरसींवा क्षेत्र का कूंरा जिसे अब उसके ऐतिहासिक नाम कुंवरगढ़ से पहचान दिलाने की दिशा में सरकार ने कदम बढ़ाया है अपने भीतर इतिहास की कई परतें समेटे हुए है। यहां ग्रामीणों के मुताबिक कभी 100 से अधिक तालाब हुआ करते थे। आज संरक्षण के अभाव में लगभग 50 तालाब ही बचे होने की बात कही जाती है। एक तरफ सदियों पुरानी धरोहरें हैं तो दूसरी तरफ उनके धीरे-धीरे मिटने की चिंता।
कुंवरगढ़ की कहानी सिर्फ एक पुराने नाम की वापसी की नहीं है। यह उस विरासत की कहानी है जिसमें जल संरक्षण की परंपरा, धार्मिक आस्था, प्राचीन कला और सामाजिक एकता एक ही जगह दिखाई देती है। आज जब शहरों में जल संकट और गिरते भूजल स्तर की चर्चा होती है तब कुंवरगढ़ का इतिहास एक अलग ही तस्वीर सामने रखता है। स्थानीय ग्रामीणों के अनुसार इस गांव और आसपास के क्षेत्र में कभी 100 से अधिक तालाब थे। इन जलस्रोतों का इस्तेमाल निस्तारी, पशुओं, खेती और दैनिक जरूरतों के लिए किया जाता था। तालाब केवल पानी जमा करने की जगह नहीं थे बल्कि ग्रामीण जीवन और सामुदायिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा थे।
लेकिन ग्रामीणों का दावा है कि समय के साथ उपेक्षा, अतिक्रमण और संरक्षण के अभाव ने इस ऐतिहासिक जल विरासत को नुकसान पहुंचाया। उनके मुताबिक अब लगभग 50 तालाब ही बचे हैं। यदि यह आंकड़ा सरकारी राजस्व रिकॉर्ड और पुराने नक्शों से पुष्ट होता है तो यह सिर्फ तालाबों की संख्या घटने का मामला नहीं बल्कि गांव की पारंपरिक जल व्यवस्था में आए बड़े बदलाव का संकेत होगा।
कुंरा में जिन तालाबों ने पीढ़ियों तक गांव की जरूरतें पूरी कीं उनकी मौजूदा स्थिति का व्यवस्थित सर्वेक्षण क्यों नहीं किया गया? कितने तालाब राजस्व रिकॉर्ड में दर्ज हैं? कितनों का मूल स्वरूप बचा है और कितनों पर अतिक्रमण या अन्य तरह के बदलाव हुए हैं? इन सवालों के जवाब सामने आना जरूरी है।
कुंवरगढ़ के तालाबों का इतिहास दस्तावेजों में दर्ज किया जाए और बचे हुए जलस्रोतों का संरक्षण हो तो यह पहल केवल एक गांव नहीं बल्कि छत्तीसगढ़ की पारंपरिक जल संस्कृति को बचाने की मिसाल बन सकती है। कुंवरगढ़ की एक और खास पहचान यहां का सांप्रदायिक सौहार्द है। स्थानीय लोगों के अनुसार गांव में मंदिर और मस्जिद एक-दूसरे से सटी हुई हैं। दोनों की दीवारें आपस में जुड़ी हैं। यह भौतिक निकटता गांव के सामाजिक जीवन में धार्मिक सह-अस्तित्व की एक खास तस्वीर पेश करती है।
आज जब धर्म और आस्था के नाम पर समाज में टकराव की खबरें सामने आती हैं तब एक ही दीवार से सटे मंदिर और मस्जिद की मौजूदगी अपने आप में ध्यान खींचती है। यह दृश्य याद दिलाता है कि अलग-अलग धार्मिक परंपराओं को मानने वाले लोग एक ही गांव, एक ही रास्ते और एक ही सामाजिक परिवेश में साथ रह सकते हैं।
हालांकि सांप्रदायिक सौहार्द का वास्तविक अर्थ केवल दो धार्मिक स्थलों का पास-पास होना नहीं बल्कि उनके आसपास रहने वाले लोगों के आपसी संबंधों, सहयोग और साझा जीवन में दिखाई देता है। कुंवरगढ़ की इस पहचान को समझने के लिए स्थानीय लोगों की स्मृतियां, धार्मिक परंपराएं और गांव का सामाजिक इतिहास भी दर्ज किया जाना चाहिए। यह गांव अपने इस स्वरूप के जरिए एक जरूरी संदेश देता है धार्मिक पहचान अलग हो सकती है लेकिन साझा समाज की बुनियाद आपसी सम्मान और सह-अस्तित्व पर टिकी होती है।
कुंवरगढ़ की ऐतिहासिक पहचान में महामाया मंदिर का विशेष स्थान बताया जाता है। स्थानीय मान्यताओं और ग्रामीणों के अनुसार इस मंदिर का संबंध गोंड राजा के समय से है। मंदिर केवल पूजा-अर्चना का केंद्र नहीं बल्कि गांव की पुरानी आस्था और ऐतिहासिक स्मृति का हिस्सा भी है। ऐसे प्राचीन धार्मिक स्थलों का महत्व समझने के लिए उनके निर्माण की शैली, स्थापत्य, मूर्तियों, शिलालेखों और उपलब्ध ऐतिहासिक दस्तावेजों का अध्ययन आवश्यक है। यदि महामाया मंदिर के गोंडकालीन होने की पुष्टि प्रमाणित अभिलेखों या पुरातात्विक अध्ययन से होती है तो यह कुंवरगढ़ के इतिहास को और ठोस आधार दे सकता है।
मंदिर की मौजूदा स्थिति, उसके पुराने स्वरूप और समय के साथ हुए बदलावों का दस्तावेजीकरण भी जरूरी है। स्थानीय इतिहास अक्सर लोगों की स्मृतियों में जीवित रहता है, लेकिन यदि उसे समय रहते लिखित रूप में दर्ज नहीं किया गया तो कई महत्वपूर्ण जानकारियां अगली पीढ़ियों तक नहीं पहुंच पातीं।
कुंवरगढ़ की ऐतिहासिक विरासत में चतुर्भुजी प्रतिमा का उल्लेख भी विशेष महत्व रखता है। स्थानीय स्तर पर इसे बौद्धकालीन बताया जाता है। यदि इसकी प्राचीनता और काल निर्धारण की पुष्टि विशेषज्ञ जांच से होती है तो यह प्रतिमा क्षेत्र के कला इतिहास और धार्मिक-सांस्कृतिक अतीत को समझने के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकती है। चतुर्भुजी प्रतिमा का अर्थ सामान्यतः चार भुजाओं वाली प्रतिमा से है। लेकिन केवल इस स्वरूप के आधार पर किसी प्रतिमा को बौद्धकालीन या किसी खास धार्मिक परंपरा से संबंधित घोषित नहीं किया जा सकता। इसके लिए प्रतिमा की शैली, प्रतीक चिह्नों, निर्माण सामग्री और पुरातात्विक संदर्भों का विशेषज्ञों द्वारा परीक्षण जरूरी है।
यही वजह है कि ऐसी धरोहरों को केवल स्थानीय मान्यता तक सीमित रखने के बजाय पुरातत्व विभाग और इतिहास के जानकारों से उनका अध्ययन कराया जाना चाहिए। प्रतिमा का सही काल निर्धारण होने पर कुंवरगढ़ के इतिहास को प्रमाणिक रूप से सामने लाने में मदद मिल सकती है। कुंवरगढ़ की सबसे बड़ी जरूरत अब अपनी ऐतिहासिक संपदा की पहचान और सुरक्षा है। गांव में कभी 100 से अधिक तालाब होने का दावा अब लगभग 50 तालाब बचे होने की ग्रामीणों की जानकारी, गोंड राजा के समय से जुड़ा महामाया मंदिर और बौद्धकालीन बताई जाने वाली चतुर्भुजी प्रतिमा ये सभी विषय व्यवस्थित शोध और दस्तावेजीकरण की मांग करते हैं।
सबसे पहले गांव के पुराने राजस्व नक्शों, बंदोबस्त अभिलेखों और अन्य ऐतिहासिक दस्तावेजों से तालाबों की वास्तविक संख्या का पता लगाया जा सकता है। इसके बाद प्रत्येक तालाब की वर्तमान स्थिति, जलग्रहण क्षेत्र और अतिक्रमण की स्थिति का सर्वेक्षण किया जाना चाहिए। ऐतिहासिक मंदिरों और प्रतिमा की स्थिति का भी विशेषज्ञों से आकलन कराया जाना जरूरी है। कुंवरगढ़ की विरासत को संरक्षित करने की पहल स्थानीय लोगों की भागीदारी से आगे बढ़े तो इसके परिणाम ज्यादा टिकाऊ हो सकते हैं। गांव के बुजुर्गों से इतिहास संबंधी जानकारी जुटाना, पुराने स्थलों की तस्वीरें और दस्तावेज संकलित करना तथा नई पीढ़ी को इन धरोहरों से परिचित कराना भी इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकते हैं।
27 अक्टूबर को मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट बैठक में कूंरा का नाम बदलकर कुंवरगढ़ करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी गई। इससे क्षेत्र को उसके ऐतिहासिक नाम से पहचान दिलाने की पहल को प्रशासनिक समर्थन मिला है। लेकिन इस कहानी का महत्व केवल नाम परिवर्तन तक सीमित नहीं है। कुंवरगढ़ की असली पहचान उसके तालाबों, मंदिरों, प्रतिमा और सामाजिक सौहार्द में भी छिपी है। यदि इन धरोहरों का संरक्षण नहीं हुआ, तो नाम बदलने के बावजूद इतिहास का बड़ा हिस्सा धीरे-धीरे खो सकता है।