गौरा-गौरी पूजन (सोर्स - नवभारत लाइव)
रायपुर

नवापारा में लोकआस्था का रंग, यादव समाज की सहाड़ा देव में पूजा और त्रिवेणी संगम में गौरा-गौरी का विसर्जन

Annakut Festival in Chhattisgarh : छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति और धार्मिक परंपराओं में दीपावली के बाद मनाए जाने वाले गौरा-गौरी और अन्नकूट पर्व का विशेष स्थान है।

चंदू निर्मलकर

Highlights

  • यह पर्व केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं रहता।

  • प्रसाद ग्रहण करने के लिए बड़ी संख्या में पहुंचते हैं श्रद्धालु।

  • छोटे मिट्टी के हांडी के पात्र को कहा जाता है आटका।

  • लोग एक-दूसरे से मिलकर पर्व की शुभकामनाएं देते है।

  • श्रद्धालु बैठकर भरपेट प्रसाद ग्रहण करते हैं।

Navapara Gaura-Gauri and Annakoot Festival: छत्तीसगढ़ की लोकसंस्कृति और धार्मिक परंपराओं में दीपावली के बाद मनाए जाने वाले गौरा-गौरी और अन्नकूट पर्व का विशेष स्थान है। नवापारा नगर में यह पर्व केवल पूजा-अर्चना तक सीमित नहीं रहता, बल्कि मंदिरों के भोग-भंडारे, समाज की पारंपरिक रस्मों, मोहल्लों में गौरा-गौरी की स्थापना और त्रिवेणी संगम में विसर्जन के साथ सामूहिक उत्सव का रूप ले लेता है। वर्षों से चली आ रही इन परंपराओं में नगर की धार्मिक आस्था, सामाजिक एकता और छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति की झलक दिखाई देती है।

सत्यनारायण मंदिर में 56 भोग, आटका में मिलता है प्रसाद

नगर के सत्यनारायण मंदिर में अन्नकूट का आयोजन वर्षों से विशेष आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। यहां शाम 4 बजे से रात 10 बजे तक श्रद्धालुओं को अन्नकूट का प्रसाद वितरित किया जाता है। मंदिर में भगवान को 56 भोग अर्पित करने की परंपरा है। इसके बाद श्रद्धालुओं को छोटे मिट्टी के हांडी जैसे पात्र, जिसे स्थानीय भाषा में आटका कहा जाता है, उसमें प्रसाद दिया जाता है। इसकी खासियत यह है कि श्रद्धालु यहां बैठकर भरपेट प्रसाद ग्रहण करते हैं। आयोजन की यह परंपरा ओडिशा के जगन्नाथ मंदिर की भोग परंपरा की याद दिलाती है। प्रसाद ग्रहण करने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं और देर शाम तक धार्मिक माहौल बना रहता है।

राधा-कृष्ण मंदिर में खिचड़ी भंडारा

इसी तरह राधा-कृष्ण मंदिर में खिचड़ी का भोग और भंडारे का आयोजन किया जाता है। श्रद्धालु भगवान को भोग अर्पित करने के बाद प्रसाद ग्रहण करते हैं। और श्रद्धालु अंचल से आकर अपने घरों में ले जाते है अन्नकूट के अवसर पर मंदिरों में होने वाले ये आयोजन अन्न के प्रति सम्मान और सामूहिक सेवा भावना को प्रदर्शित करते हैं। यहां अमीर-गरीब, छोटे-बड़े का भेद मिटाकर सभी एक साथ प्रसाद ग्रहण करते हैं।

यादव समाज करते है सहाड़ा देव की पूजा

नगर में यादव समाज की भी अपनी विशिष्ट धार्मिक परंपरा है। समाज के लोग सहाड़ा देव में पारंपरिक विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर भोग अर्पित करते हैं। इसके बाद भोग-भंडारे का आयोजन होता है। सत्यदेव मंदिर में भी भोग-भंडारे के माध्यम से श्रद्धालुओं को प्रसाद वितरित किया जाता है। इन आयोजनों में समाज के लोगों की सहभागिता और परंपराओं के प्रति उनकी श्रद्धा देखने को मिलती है।

हर वार्ड में गौरा-गौरी की स्थापना, त्रिवेणी संगम में विसर्जन

गौरा-गौरी पर्व की रौनक नगर के लगभग हर वार्ड और मोहल्ले में दिखाई देती है। विभिन्न स्थानों पर मिट्टी से गौरा-गौरी की प्रतिमाएं तैयार कर उनकी स्थापना की जाती है। भगवान शिव और माता पार्वती के प्रतीक गौरा-गौरी की पूजा को पारिवारिक सुख-समृद्धि, दांपत्य जीवन की मंगलकामना और लोकआस्था से जोड़कर देखा जाता है।

पूजा के दौरान पारंपरिक गीत-संगीत और बाजे-गाजे के बीच उत्सवी माहौल बनता है। इसके बाद श्रद्धालु सामूहिक रूप से गौरा-गौरी की प्रतिमाओं को लेकर त्रिवेणी संगम पहुंचते हैं, जहां विधि-विधान से विसर्जन किया जाता है। इस दौरान नगर में अलग-अलग वार्डों और समाजों के लोग एक-दूसरे से मिलते हैं और पर्व की शुभकामनाएं देते हैं।

अन्न के सम्मान और अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ने का पर्व

अन्नकूट जहां अन्न की महत्ता, किसान के परिश्रम और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता का संदेश देता है, वहीं गोरा-गौरी की परंपरा पारिवारिक मंगल और लोकआस्था का प्रतीक है। छत्तीसगढ़ की कृषि प्रधान संस्कृति में धान, गौवंश और खेती-किसानी का विशेष महत्व रहा है। ऐसे में दीपावली के बाद मनाए जाने वाले ये पर्व लोगों को अपनी मिट्टी, परंपरा और सांस्कृतिक जड़ों से जोड़े रखते हैं।

गोबरा नवापारा में सत्यनारायण मंदिर का 56 भोग, राधा-कृष्ण मंदिर का खिचड़ी भंडारा, यादव समाज की सहाड़ा देव में पूजा और विभिन्न वार्डों में गौरा-गौरी की स्थापना से लेकर त्रिवेणी संगम में विसर्जन तक, हर आयोजन लोकजीवन की जीवंत तस्वीर प्रस्तुत करता है, कि त्योहारों की असली खुशी सामूहिक सहभागिता, सेवा, परंपरा और आपसी सद्भाव में है।

Story By- Vinod Jain

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