कांकेर राजपरिवार (सोर्स: नवभारत)
कांकेर

कांकेर राजमहल में अनूठा दशहरा: 60 से अधिक गांवों के आंगा देवों का महासंगम, राजपरिवार ने की विशेष पूजा-अर्चना

Kanker Dussehra 2026: विजयादशमी के अवसर पर कांकेर राजमहल में आस्था और संस्कृति का अनूठा संगम देखने को मिला, जहां अंचल के 60 से अधिक गांवों के आंगा देव पारंपरिक बाजे-गाजे के साथ पहुंचे।

मोहनीश सोनी, चंदू निर्मलकर

Highlights

  • सदियों पुरानी परंपरा आज भी कायम।

  • बाजे-गाजे के साथ राजमहल पहुंचे देवी-देवता।

  • सुख-समृद्धि की कामना के साथ दिया सामाजिक एकता का संदेश।

  • कांकेर रियासत में दशहरे की सदियों पुरानी परंपरा निभाई।

Chhattisgarh Dussehra Utsav 2026: छत्तीसगढ़ की ऐतिहासिक कांकेर रियासत में दशहरे की सदियों पुरानी परंपरा आज भी पूरे श्रद्धा, उत्साह और भव्यता के साथ निभाई जा रही है। विजयादशमी पर्व के अवसर पर कांकेर राजमहल में आस्था और संस्कृति का अनूठा संगम देखने को मिला, जहां अंचल के 60 से अधिक गांवों के आंगा देव पारंपरिक बाजे-गाजे के साथ पहुंचे। राजपरिवार के मुखिया डॉ. आदित्य प्रताप देव ने विधि-विधान से देवी-देवताओं की विशेष पूजा-अर्चना कर कांकेरवासियों की सुख-समृद्धि और खुशहाली की कामना की।

सदियों पुरानी परंपरा, आज भी बरकरार

कांकेर का दशहरा अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक और ऐतिहासिक पहचान के लिए जाना जाता है। यहां दशहरा केवल विजयादशमी का पर्व नहीं, बल्कि अंचल की आस्था, लोकपरंपराओं और सामाजिक एकजुटता का प्रतीक है। परंपरा के अनुसार, विजयादशमी से करीब एक सप्ताह पहले ही आसपास के गांवों के आंगा देव शहर के मंदिरों में एकत्रित होने लगते हैं। इसके बाद दशहरे के दिन पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज के बीच उन्हें राजमहल लाया जाता है, जहां राजपरिवार द्वारा विधिवत पूजा-अर्चना की जाती है।

बाजे-गाजे की धुन पर झूमे आंगा देव

इस वर्ष भी राजमहल में आस्था का अद्भुत नजारा देखने को मिला। विभिन्न गांवों से पहुंचे देवी-देवता अपनी पारंपरिक शैली और लय के साथ आयोजन में शामिल हुए। पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज और धार्मिक उत्साह ने पूरे माहौल को भक्तिमय बना दिया। इस ऐतिहासिक परंपरा को देखने और देवी-देवताओं के दर्शन करने के लिए शहर सहित आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों से बड़ी संख्या में श्रद्धालु राजमहल पहुंचे।

सामाजिक एकता और समरसता का संदेश

कांकेर राजपरिवार के मुखिया डॉ. आदित्य प्रताप देव ने बताया कि कांकेर रियासत में दशहरा मनाने की परंपरा अन्य स्थानों से अलग है। यहां अंचल के पूर्वज देवी-देवताओं को आमंत्रित कर उनकी पूजा-अर्चना की जाती है। यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि समाज की विभिन्न सकारात्मक शक्तियों को एक साथ जोड़ने, आपसी तालमेल बढ़ाने और सामाजिक संतुलन स्थापित करने का संदेश भी देता है।

अनेक देवी-देवताओं की उपस्थिति बनी आकर्षण

कांकेर अंचल के विभिन्न क्षेत्रों से चिवरांज, बांसला, सरोना, दुधावा सहित अनेक गांवों के देवी-देवता इस आयोजन में शामिल हुए। आंगा देव, शीतला, बूढ़ादेव और लमसेना सहित विभिन्न देवी-देवताओं की उपस्थिति ने आयोजन की भव्यता बढ़ाई। सभी देवी-देवताओं का एक साथ राजमहल पहुंचना अंचल की समृद्ध लोकसंस्कृति, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक समरसता का प्रतीक माना जाता है।

कांकेर राजपरिवार मुखिया डॉ. आदित्य प्रताप देव ने कहा कि कांकेर राजमहल का यह दशहरा आज भी इस बात का प्रमाण है कि आधुनिकता के दौर में भी क्षेत्र की सदियों पुरानी परंपराएं लोगों की आस्था और सांस्कृतिक पहचान को मजबूती से जोड़े हुए हैं।

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