President Draupadi Murmu In Bastar : 23 अक्टूबर को बस्तर के ऐतिहासिक मुरिया दरबार में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू शामिल होंगी। बस्तर दशहरा की 650 साल पुरानी इस परंपरा में पहली बार देश की प्रथम महिला आदिवासियों से सीधे संवाद करेंगी।
देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू जल्द जगदलपुर आ रही हैं। वह 23 अक्टूबर को ऐतिहासिक मुरिया दरबार में शामिल होंगी। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने नई दिल्ली में उन्हें निमंत्रण दिया था। राष्ट्रपति ने इस न्योते को सहर्ष स्वीकार कर लिया है। उनके आगमन से पूरे बस्तर क्षेत्र में बहुत खुशी है।
नई दिल्ली में निमंत्रण देते समय कई नेता मौजूद थे। केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू वहां उपस्थित रहे। राज्य के संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री राजेश अग्रवाल भी शामिल थे। बस्तर सांसद महेश कश्यप भी इस दौरान साथ रहे। सभी नेताओं ने राष्ट्रपति का आभार व्यक्त किया है।
बस्तर दशहरा करीब 75 दिनों तक मनाया जाने वाला त्योहार है। इसकी सबसे अंतिम और महत्वपूर्ण रस्म मुरिया दरबार है। रियासत काल से ही यह परंपरा लगातार चली आ रही है। पुराने समय में राजा दरबार में लोगों की शिकायतें सुनते थे। वे मौके पर ही जनसमस्याओं का समाधान भी करते थे।
इस बार यह सदियों पुरानी परंपरा पूरी तरह बदलने वाली है। 650 साल के इतिहास में यह पहला मौका होगा। कोई महिला प्रतिनिधि आदिवासियों से सीधे रूबरू होकर बात करेगी। देश की प्रथम महिला का आगमन बस्तर के लिए ऐतिहासिक है। स्थानीय जनजातीय समाज इस पल का बेसब्री से इंतजार कर रहा है।
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू का बस्तर से पुराना और गहरा जुड़ाव रहा है। यह उनका बस्तर क्षेत्र का दूसरा अधिकारिक प्रवास होगा। इससे पहले फरवरी 2026 में वह जगदलपुर आई थीं। तब उन्होंने बस्तर पंडुम कार्यक्रम का शानदार उद्घाटन किया था। उस दौरान भी लोगों ने उनका भव्य स्वागत किया था।
इसके बाद जुलाई 2026 में भी एक अहम मुलाकात हुई थी। बस्तर के एक विशेष प्रतिनिधिमंडल ने राष्ट्रपति से मुलाकात की थी। राष्ट्रपति मुर्मु जनजातीय संस्कृति और परंपराओं को बहुत सम्मान देती हैं। उनका यह दौरा बस्तर के सांस्कृतिक गौरव को नई ऊंचाई देगा।
मुरिया दरबार बस्तर दशहरा का एक बेहद महत्वपूर्ण विधान है। जगदलपुर के सिरहासर भवन में यह दरबार सजाया जाता है। इसमें विभिन्न क्षेत्रों के पारंपरिक प्रतिनिधि आकर हिस्सा लेते हैं। समाज के वरिष्ठ और प्रतिष्ठित लोग भी इसमें शामिल होते हैं।
इस सामाजिक व्यवस्था में मांझी और चालकी की मुख्य भूमिका रहती है। ये पारंपरिक पदवी धारक ग्रामीण समस्याओं को दरबार में रखते हैं। प्रशासनिक अधिकारी और जन प्रतिनिधि भी वहां मौजूद रहते हैं। सब मिलकर बस्तर के विकास और कल्याण पर चर्चा करते हैं।