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क्या टल जाएगी Tata Sons की लिस्टिंग? टाटा ट्रस्ट्स के नए प्रस्ताव से बदला पूरा गेम, जानें पूरी डिटेल्स

Tata Sons Listing: टाटा ट्रस्ट्स ने TESS और TCE को Tata Sons में मर्ज करने का प्रस्ताव देकर पूरा गेम बदल दिया है। जानें यह कदम कैसे टाटा संस को अनलिस्टेड प्राइवेट कंपनी का दर्जा बरकरार रख सकता है।

मनोज आर्या

Tata Trusts Merges TESS, TCE into Tata Sons: टाटा संस में 66 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखने वाले टाटा ट्रस्ट्स ने कंपनी के स्ट्रक्चर में बड़े बदलाव की कवायद शुरू कर दी है। ट्रस्ट्स ने टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स सिस्टम सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड (TESS) और टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स (TCE) का टाटा संस में विलय का प्रस्ताव रखा है।

ट्रस्ट की ओर से सोमवार को जारी एक बयान में इस बात की जानकारी दी गई है। नमक से सॉफ्टवेयर, कार और एयरलाइन तक का बिजनेस करने वाले टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी टाटा संस ही है।

ट्रस्ट्स ने टाटा संस के सामने रखा प्रस्ताव

ट्रस्ट्स का तर्क है कि ऐसा करने से टाटा संस गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनी (NBFC) और कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (CEC), दोनों की कैटेगरी से बाहर हो जाएगी। इस कदम से उसका स्टेटस अनलिस्टेड प्राइवेट कंपनी का बना रहेगा। ट्रस्ट्स ने टाटा संस के बोर्ड से इस प्रस्ताव पर विचार कर जरूरी फैसला लेने को कहा है। इनमें आरबीआई से पहले से एनओसी (NOC) लेना भी शामिल है।

लिस्टिंग को लेकर टाटा ग्रुप में कैसा विवाद?

टाटा ट्रस्ट्स का यह प्रस्ताव ऐसे समय में आया जब ट्रस्ट्स और टाटा संस के बोर्ड के बीच कंपनी के भविष्य के मालिकाना ढांचे पर विवाद चरम पर है। अक्टूबर 2024 से नोएल टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन का पद संभाल रहे हैं। ट्रस्ट्स शुरुआत से ही टाटा संस को शेयर बाजार में लिस्टिंग के खिलाफ रहा है। जुलाई 2025 में सर्वसम्मति से यह तय हुआ था कि कंपनी को अनलिस्टेड प्राइवेट यूनिट के रूब में ही बनाए रखने की कोशिश की जाए।

2022 में हुई थी इस विवाद की शुरुआत

बता दें कि इस विवाद की शुरुआत 2022 से हुई, जब भारतीय रिजर्व बैंक ने टाटा संस को अपर-लेयर NBFC के दायरे से बाहर निकलने की अर्जी दी थी, लेकिनि आरबीआई ने सितंबर में उसे खारिज कर दिया। इसके बाद लिस्टिंग का मामला अब भी सुलझा नहीं है।

एन चंद्रशेखरन की नियुक्ति पर भी विवाद

टाटा ग्रुप में इस समय विवाद सिर्फ कंपनी के लिस्टिंग को लेकर ही नहीं है। टाटा संस के चेयरमैन एन चंद्रशेखरन की नियुक्ति भी इसकी एक बड़ी वजह बन गई है। जुलाई 2025 में ट्रस्ट्स ने चंद्रशेखरन के तीसरे कार्यकाल के तौर पर पांच साल दोबार नियुक्त करने के प्रस्ताव को समर्थन किया था।

हालांकि, बाद में चंद्रशेखर ने खुद साफ किया कि वे मौजूदा कार्यकाल तक ही इस पद पर रहेंगे। बावजूद इसके 2026 में बोर्ड ने उन्हें फिर नियुक्त करने का फैसला किया और ट्रस्ट्स ने इसका विरोध किया।

टाटा संस के सामने अब रास्ता क्या?

नोएल टाटा और ट्रस्ट्स का मानना है कि टाटा संस के कानून के अनुसार, ऐसे पद पर नियुक्ति के लिए ट्रस्ट्स की ओर से नोमिनेटेड डायरेक्टरों की सहमति जरूरी है। इसी आधार पर उन्होंने बोर्ड के फैसले को अवैध बताया। हालांकि, बोर्ड ने चंद्रशेखरन का समर्थन किया और बाकी जरूरी कानूनी कदम उठाए।

अब ट्रस्ट्स का नया प्रस्ताव टाटा संस को शेयर बाजार में लिस्ट कराने की शर्त से बचने का एक रास्ता सुझाता है। खास बात यह है कि इसके तहत टाटा संस को प्राइवेट कंपनी का दर्जा भी बरकरार रखा जा सकता है।

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