महंगाई और रेपो रेट का कनेक्शन (सोर्स- AI जेनरेटेड इमेज)
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Explainer: महंगाई और रेपो रेट का क्या है कनेक्शन, कैसे काम करता है RBI का यह फॉर्मूला; जानें सबकुछ

Repo Rate: RBI की मॉनिटरी पॉलिसी और रेपो रेट का अर्थव्यवस्था पर प्रभाव। जानें कैसे महंगाई और आर्थिक स्थिति के आधार पर रेपो रेट तय होता है और इसका आपके वित्तीय जीवन पर क्या असर पड़ता है।

मनोज आर्या

RBI Repo Rate Explained: भारती रिजर्व बैंक की मॉनिटरी पॉलिसी कमेटी ने नीतिगत दरों को बढ़ाने का ऐलान किया है। बुधवार को आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा की अध्यक्षता वाली कमेटी ने सर्वसम्मति से रेपो रेट में 25 बेसिस प्वाइंट्स (bps) की बढ़ोतरी को मंजूरी दी। रेपो रेट अब 5.25 फीसदी से बढ़कर 5.5 फीसदी कर दिया है।

इससे पहले फरवरी 2023 में RBI ने ब्याज दरों में बढ़ोतरी किया था। एक्सपर्ट्स का मानना है कि बढ़ती महंगाई और कमजोर रुपये के बीच केंद्रीय बैंक ने आगे भी दरें बढ़ने के संकेत दिए हैं।

आगे और बढ़ सकती हैं ब्याज दरें- RBI

भारतीय रिजर्व बैंक ने स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलीटी (SDF) रेट को 5.25 फीसदी कर दिया है, जबकि मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी (MSF) रेट और बैंक रेट 5.75 पर बरकरार रखा गया है। मॉनिटरी पॉलिसी कमेटी ने अपने रूख को बदलकर 'कैलिब्रेटेड टाइटनिंग' कर दिया। यह इस बात के संकेत हैं कि ब्याज दरें आगे बढ़ेंगी या फिर स्थिर रहेंगी। इससे पहले आरबीआई का रुख न्यूट्रल था।

2025 में रेपो रेट में 4 बार कटौती

रिजर्व बैंक के गर्वनर संजय मल्होत्रा ने कहा कि मौजूदा हालात में निकट भविष्य में ब्याज दरों में कटौती की संभावना नहीं है। आगे दरें बढ़ाई जा सकती हैं या स्थिर रखी जा सकती हैं। उन्होंने कहा कि आगे ब्याज दरें कब और कितनी बढ़ेंगी, यह महंगाई और इकोनॉमिक ग्रोथ की स्थिति पर निर्भर करेगा।

Repo Rate क्या है?

रेपो, पुनर्खरीद समझौता (Repurchase Agreement) का छोटा रूप है। यह एक शॉर्ट-टर्म, कोलैटरलाइज्ड उधार लेने का व्यवस्था है, जिसमें एक पार्टी दूसरी पार्टी को सिक्योरिटीज बेचती है और उन्हें पहले से तय तारीख और कीमत पर वापस खरीदने के लिए सहमत होती है। रेपो रेट वह सालाना ब्याज दर है जो लोन देने वाले से लोन लेने वाले को ट्रांसफर किए गए फंड पर लगता है।

आसान भाषा में यह वह रेट है जिस पर आरबीआई कमर्शियल बैंकों को पैसा उधार देता है। बदले में कमर्शियल बैंक आरबीआई को सरकारी सिक्योरिटीज बेचते हैं, जिसके साथ पहले से तय कीमत और समय पर उन्हें वापस खरीदने का एग्रीमेंट होता है।

Repo Rate कौन तय करता है?

रेपो रेट को किसी आसान फॉर्मूले से कैलकुलेट नहीं किया जा सकता। दर मौजूदा आर्थिक और मनी-मार्केट की स्थितियों के आधार पर तय किया जाता है। रेपो रेट तय करने की जिम्मेदारी भारतीय रिजर्व बैंक की है। RBI की मॉनेटरी पॉलिसी कमिटी, महंगाई, आर्थिक स्थिति और करेंसी की वैल्यू जैसे मार्केट की स्थितियों की ध्यान से जांच करने के बाद रेपो रेट तय करती है। कमिटी मार्केट की स्थितियों की जांच करने के लिए हर दो महीने में एक मीटिंग भी करती है।

कौन तय करता है रेपो रेट?

रेपो रेट तय करते समय, RBI महंगाई, फाइनेंशियल सिस्टम में लिक्विडिटी, उधार लेने की स्थिति और दूसरे मुद्रा रेट जैसे फैक्टर्स को देखता है। फिर यह तय करता है कि रेट को बढ़ाना है, घटाना है या वैसा ही रखना है। इसके बाद रेपो रेट का इस्तेमाल अर्थव्यवस्था की महंगाई और लिक्विडिटी को नियंत्रित करने के लिए असरदार तरीके से किया जा सकता है।

Repo में इस्तेमाल होने वाले इंस्ट्रूमेंट्स

रेपो ट्रांजैक्शन के लिए सिक्योरिटीज को कोलैटरल के तौर पर इस्तेमाल करने की जरूरत होती है। आरबीआई के टेक्स्ट में सरकारी डेटेड सिक्योरिटीज, ट्रेजरी बिल, कॉर्पोरेट बॉन्ड, मनी-मार्केट सिक्योरिटीज और इक्विटी जैसे इंस्ट्रूमेंट्स की लिस्ट है, जिनका इस्तेमाल ट्रांजैक्शन के लिए किया जा सकता है।

रेपो अलग-अलग तरह के भी हो सकते हैं, जिनमें बाय-सेल बैक रेपो, क्लासिक रेपो, बॉन्ड लेंडिंग और बॉरोइंग, और ट्राइपार्टाइट रेपो शामिल हैं। ये अरेंजमेंट के आधार पर ओवरनाइट, फिक्स्ड टर्म के लिए, ओपन-एंडेड या फ्लेक्सिबल हो सकते हैं।

RBI क्यों करता है रेपो का इस्तेमाल?

रेपो जरूरी हैं क्योंकि वे आर्थिक जरूरतों को पूरा करने में मदद करते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक, लिक्विडिटी पर असर डालने और मुद्रा बाजार दर में शॉर्ट-टर्म उतार-चढ़ाव को कम करने के लिए ओपन-मार्केट ऑपरेशन्स के हिस्से के तौर पर रेपो ट्रांजैक्शन का इस्तेमाल कर सकता है।

Repo Rate का आम आदमी पर क्या असर?

एक आम आदमी के लिए रेपो रेट कोई लोन रेट नहीं है, जिसे आप सीधे आरबीआई को देते हैं। इसकी अहमियत इनडायरेक्ट है। जब RBI रेपो रेट बदलता है, तो यह शॉर्ट-टर्म मनी मार्केट के हालात बदल देता है। इससे वित्तीय संस्थान जिस कीमत पर लोन लेते हैं, उस पर असर पड़ सकता है और बदले में उधार लेने और निवेश के हालात पर असर पड़ सकता है।

आसान शब्दों में कहें तो जब रेपो रेट बढ़ता है तो आपके लोन, ईएमआई के ब्याद दर भी बढ़ सकते हैं। हालांकि, आम आदमी लोन पर लगने वाले ब्याज दर फंड देने वाले बैंक और वित्तिय संस्थानों पर निर्भर करता है।

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