तुर्की के राष्ट्रपति और पाकिस्तान पीएम। इमेज-सोशल मीडिया।
India and Turkey Relations: राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली का कार ब्लास्ट आतंकी हमला घोषित हो चुका है। इसके पीछे पाकिस्तानी आतंकी संगठन की संलिप्तता भी उजागर हो गई है। ऐसे में केंद्र सरकार के उस बयान की खूब चर्चा हो रही, जिसमें कहा गया था कि भारत के खिलाफ कोई भी आतंकी हमला एक्ट ऑफ वॉर माना जाएगा। भारत फिर पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई करेगा। लोगों में यह भी चर्चा है कि भारत पाकिस्तान के खिलाफ ऑपरेशन सिंदूर फिर शुरू करेगा तो पाकिस्तान के साथ कौन देश खड़े होंगे।
दरअसल, मई में ऑपरेशन सिंदूर के दौरान पाकिस्तान का साथ चीन और तुर्की ने दिया था। चीन लंबे समय से भारत विरोधी हरकते कर रहा। वहीं, भारत द्वारा हमेशा मदद किए जाने के बावजूद तुर्की विरोध में खड़ा हो रहा।
तुर्की का पाकिस्तान के साथ रिश्ता ऐतिहासिक और धार्मिक नजरिए से बहुत गहरा है। ओटोमन साम्राज्य के समय से तुर्की मुस्लिम दुनिया में एक नेतृत्वकारी भूमिका निभाता आया है। फिलहाल उसका प्रभुत्व काफी कम है, लेकिन मुस्लिम दुनिया का खलीफा बनने के कुछ तत्व तुर्की में अब भी मौजूद हैं। वे बार-बार खुद को खलीफा साबित करने के लिए अहम कदम उठाते हैं। पाकिस्तान के स्थापना के बाद से दोनों देशों ने धार्मिक और सांस्कृतिक संबंद्धों को मजबूती दी। 1947 के बाद दोनों देशों ने कई बार सैन्य और राजनीतिक समझौते किए हैं। अक्सर तुर्की मुस्लिम देशों में भारत के खिलाफ पाकिस्तान के नजरिये को समर्थन देता है। जैसे-कश्मीर मुद्दे पर सार्वजनिक बयान और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान की आतंकवादी सोच का समर्थन देना।
बता दें कि तुर्की की विदेश नीति में दक्षिण एशिया में प्रभाव बढ़ाना है। पाकिस्तान के साथ मजबूत संबंध उसे इस क्षेत्र में फायदा पहुंचाते हैं। तुर्की ने पाकिस्तान को रक्षा तकनीक, हथियार और सैटेलाइट परियोजनाओं में सहयोग किया है। PAUSAT‑1 सैटेलाइट जैसी साझेदारियां बताती हैं कि तुर्की पाकिस्तान को तकनीकी रूप से मजबूत कर भारत के प्रभाव को बैलेंस करने में जुटा है। वित्त वर्ष 2022–23 में तुर्की ने पाकिस्तान को सेना और वायु रक्षा तकनीक में काफी मदद की थी। यह सहयोग भारत के खिलाफ अप्रत्यक्ष संदेश भी है।
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तुर्की वैश्विक गठबंधनों के मुताबिक भी कदम उठाता है। तुर्की को चीन और पाकिस्तान के साथ नजदीकी आर्थिक और राजनीतिक लाभ देती है। तुर्की भारत विरोधी कदम उठाकर संदेश देता है कि वह मुस्लिम देशों के बीच नेतृत्वकर्ता है। वह दक्षिण एशिया में सामरिक संतुलन में भूमिका निभाना चाहता है।