रूस और ईरान पर अमेरिका की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’! तेल बेचने पर मिली छूट खत्म, भारत समेत कई देशों में हड़कंप
US-Iran War: अमेरिका ने रूसी और ईरानी तेल पर प्रतिबंधों में दी गई छूट को रिन्यू न करने का फैसला किया है। भारत के लिए सस्ता तेल खरीदना मुश्किल होगा और वैश्विक ऊर्जा बाजार में कीमतें बढ़ सकती हैं।
- Written By: अक्षय साहू
अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट (सोर्स- सोशल मीडिया)
US Refuses to Extend Iranian-Russian Oil Sanctions: होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर बढ़ते तनाव के बीच अमेरिका ने एक बड़ा फैसला लिया है, जिसका असर कई देशों पर पड़ सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका अब उस छूट (waiver) को आगे नहीं बढ़ाएगा, जिसके तहत कुछ देशों को रूसी और ईरानी कच्चा तेल खरीदने की अनुमति दी गई थी।
अमेरिकी वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने एक प्रेस ब्रीफिंग में कहा कि वॉशिंगटन इस सप्ताह समाप्त हो रही ईरानी तेल पर समुद्री प्रतिबंधों की छूट को आगे नहीं बढ़ाएगा। इसी तरह रूसी तेल से जुड़े जनरल लाइसेंस की अवधि भी अब खत्म हो जाएगी। उन्होंने कहा कि यह तेल वह था जो पहले ही 11 मार्च से पहले समुद्र में लोड किया जा चुका था और अब उसका उपयोग पूरा हो चुका है।
छूट खत्म होने से भारत पर पड़ेगा असर
इस फैसले को अमेरिका की उस नीति में बदलाव के रूप में देखा जा रहा है, जिसमें पहले वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और कीमतों को स्थिर रखने के लिए अस्थायी छूट दी गई थी। अब इस छूट को खत्म करने से उन देशों पर असर पड़ सकता है जो सस्ते रूसी और ईरानी तेल पर निर्भर थे।
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रिपोर्ट के अनुसार, भारत भी इस छूट का एक बड़ा लाभार्थी रहा है और उसने इस अवधि में रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदा था। अनुमान है कि भारत ने इस दौरान करोड़ों बैरल तेल का ऑर्डर दिया। अब छूट खत्म होने के बाद भारत के लिए सस्ते रूसी तेल की उपलब्धता सीमित हो सकती है।
ऊर्जा आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता बरकरार
यह कदम ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर ऊर्जा आपूर्ति और कीमतों को लेकर पहले से ही अनिश्चितता बनी हुई है। अमेरिका का कहना था कि यह अस्थायी छूट केवल बाजार को स्थिर रखने के लिए दी गई थी और इससे रूस और ईरान को लंबे समय तक वित्तीय लाभ नहीं मिलना चाहिए।
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पहले दिए गए 30 दिन के अस्थायी लाइसेंस का उद्देश्य भी यही बताया गया था कि भारतीय रिफाइनर और अन्य खरीदार सीमित समय के लिए तेल खरीद सकें, ताकि वैश्विक बाजार में अचानक असंतुलन न पैदा हो। अब इस छूट के समाप्त होने के साथ ही अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा व्यापार पर इसके व्यापक असर की संभावना जताई जा रही है, खासकर उन देशों के लिए जो रूसी और ईरानी कच्चे तेल पर निर्भर हैं।
