डोनाल्ड ट्रंप और खामेनेई, फोटो (सो. सोशल मीडिया)
US Iran Tension: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान को दिए गए 10-15 दिनों के अल्टीमेटम के बाद मध्य-पूर्व में युद्ध के बादल गहरे काले हो गए हैं। हालांकि, इस संभावित सैन्य कार्रवाई से ठीक पहले ट्रंप को एक बड़ा कूटनीतिक और सामरिक झटका लगा है। उनके सबसे पुराने और करीबी सहयोगी ब्रिटेन ने ईरान के खिलाफ हमले के लिए अपने डिएगो गार्सिया एयरबेस का इस्तेमाल करने से साफ इनकार कर दिया है।
हिंद महासागर में स्थित डिएगो गार्सिया एक अत्यंत आधुनिक एयरबेस है जहां से अमेरिका के B-1, B-2 स्टील्थ और B-52 जैसे विशाल बमवर्षक विमान उड़ान भरते हैं। यह बेस परमाणु पनडुब्बियों और युद्धपोतों के लिए रसद और तकनीक का मुख्य केंद्र है। ब्रिटेन के इस फैसले के बाद अब अमेरिकी फाइटर जेट्स को हमले के लिए इस एयरफील्ड का इस्तेमाल करने की लिखित अनुमति नहीं मिलेगी जिससे ट्रंप अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘अकेले’ पड़ते दिख रहे हैं।
ईरान परमाणु हथियारों पर चर्चा के लिए तो तैयार है लेकिन उसने बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और अपने क्षेत्रीय सहयोगियों की मदद रोकने से दोटूक इनकार कर दिया है। इसी जिद के कारण ट्रंप ने 15 दिनों के भीतर गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी दी है।
भले ही ब्रिटेन ने अपना बेस देने से मना कर दिया हो लेकिन अमेरिका के पास कतर (अल उदीद), बहरीन, कुवैत, यूएई, जॉर्डन और सऊदी अरब में अभी भी कई मजबूत सैन्य ठिकाने मौजूद हैं। समुद्र में USS अब्राहम लिंकन के साथ अब USS जेराल्ड आर. फोर्ड एयरक्राफ्ट कैरियर भी पहुंचने वाला है।
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अमेरिका ने साल 2003 के इराक युद्ध के बाद मध्य-पूर्व में अपनी सबसे बड़ी फौज तैनात कर दी है जिसमें 50 से अधिक एडवांस्ड फाइटर जेट्स (F-35, F-22) और आधुनिक एयर डिफेंस सिस्टम शामिल हैं। सैन्य विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह जंग शुरू हुई तो यह न केवल लंबी खिंचेगी बल्कि सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई की सेना अमेरिका को कड़ी चुनौती दे सकती है।