बांग्लादेश में तारिक रहमान की जीत: 'नो दिल्ली' नारा और भारत-बांग्लादेश रिश्तों की नई चुनौतियां

Bangladesh India Relations: तारिक रहमान की BNP ने "बांग्लादेश फर्स्ट" नारे के साथ जीत दर्ज की है। शेख हसीना का प्रत्यर्पण और तीस्ता जल विवाद जैसे मुद्दे भारत के साथ रिश्तों में बड़ी चुनौती बन सकते हैं।
Tarique Rahman's BNP Victory: What It Means for India and the "Bangladesh First" Policy
तारिक रहमान (सोर्स-सोशल मीडिया)
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Tarique Rahman Bangladesh Victory Impact: बांग्लादेश के चुनावी नतीजों के बाद तारिक रहमान के नेतृत्व वाली BNP सत्ता संभालने के लिए पूरी तरह तैयार है। पार्टी ने अपने अभियान में "न दिल्ली, न पिंडी" का नारा देकर अपनी स्वतंत्र विदेश नीति का संकेत दिया था। इस जीत ने भारत और बांग्लादेश के बीच दशकों से चले आ रहे रणनीतिक समीकरणों पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

स्वतंत्र विदेश नीति का नारा

तारिक रहमान ने चुनाव प्रचार के दौरान स्पष्ट किया कि उनकी सरकार किसी भी देश के प्रभाव में नहीं रहेगी। उन्होंने "बांग्लादेश सबसे पहले" की नीति अपनाते हुए दिल्ली और रावलपिंडी दोनों से दूरी बनाए रखने की बात कही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह रुख भारत के साथ पुराने समझौतों को फिर से परखने की दिशा में एक बड़ा कदम हो सकता है।

भारत के साथ पुराने विवाद

BNP का मानना है कि शेख हसीना के समय हुए कई समझौतों में असंतुलन है जिन्हें अब द्विपक्षीय हितों के लिए रीसेट करना होगा। इसमें तीस्ता नदी के पानी के न्यायसंगत बंटवारे का मुद्दा सबसे प्रमुख है जिसे लेकर BNP अंतरराष्ट्रीय जल कन्वेंशन का समर्थन करती है। पार्टी ने साफ कर दिया है कि वे पहले अपने देश के लोगों के हितों की रक्षा करेंगे और उसके बाद ही संबंधों को आगे बढ़ाएंगे।

शेख हसीना का प्रत्यर्पण

भारत में निर्वासित जीवन बिता रही शेख हसीना को लेकर BNP का रुख काफी कड़ा है और वे उनके प्रत्यर्पण की मांग कर रहे हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि हसीना के खिलाफ चल रहे कानूनी मामलों के लिए उन्हें बांग्लादेश वापस लाना बहुत जरूरी है। यह मुद्दा आने वाले समय में मोदी सरकार और नई बांग्लादेशी सरकार के बीच कूटनीतिक तनाव का एक बड़ा कारण बन सकता है।

राजनीति में इस्लाम और जमात

तारिक रहमान की रैलियों में धार्मिक नारों और "अल्लाह ही मालिक है" जैसे बयानों ने उनकी भविष्य की राजनीति की दिशा तय की है। 75 से ज्यादा सीटें जीतने वाली जमात-ए-इस्लामी का बढ़ता प्रभाव भी भारत के लिए एक बड़ी सुरक्षा चिंता का विषय बन गया है। दक्षिणपंथी विचारधारा के दबाव में नई सरकार का झुकाव भारत विरोधी भावनाओं की ओर बढ़ने की आशंका विशेषज्ञों द्वारा जताई जा रही है।

ऐतिहासिक अविश्वास और चुनौतियां

BNP के कुछ नेता 1971 के मुक्ति संग्राम में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका को नजरअंदाज करते हैं, जिससे दोनों देशों में अविश्वास बढ़ता है। अतीत में भी BNP और जमात की गठबंधन सरकारों के दौरान भारत के साथ संबंधों में काफी उतार-चढ़ाव और सुरक्षा तनाव देखा गया था। अब देखना होगा कि व्यापार और भूगोल की मजबूरियों के बीच तारिक रहमान भारत के साथ संबंधों को कैसे संतुलित कर पाते हैं।

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