नेपाल के गोरखा युवाओं का प्रदर्शन: खाड़ी देशों की नौकरी ठुकराई, भारतीय सेना में भर्ती फिर शुरू करने की मांग

Nepal Protest: नेपाल के पोखरा में गोरखा युवाओं का प्रदर्शन चल रहा है। खाड़ी देशों की नौकरी छोड़ भारतीय सेना में अग्निवीर भर्ती शुरू करने की मांग। 207 साल पुरानी परंपरा बचाने को सरकार को सौंपा ज्ञापन।
Nepal Gurkha soldiers protesting in Pokhara for Indian Army recruitment representative image
सांकेतिक फोटो सोशल मीडिया
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Nepal Gurkha Protest In Pokhara: नेपाल के पोखरा शहर की सड़कों पर इन दिनों एक अनोखा प्रदर्शन देखने को मिल रहा है। जहां दुनिया भर में नौकरियों के लिए मारामारी है, वहीं नेपाली गोरखा युवाओं और पूर्व सैनिकों की एक ही मांग है कि उन्हें भारतीय सेना में अग्निवीर बना दिया जाए। पूर्व गोरखा सैनिकों और उनके समर्थकों ने चेतावनी दी है कि यदि उनकी मांगें पूरी नहीं हुई, तो यह आंदोलन और भी उग्र रूप धारण कर लेगा।

पोखरा की सड़कों पर उतरे पूर्व गोरखा सैनिक

भारतीय सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ की नेपाल यात्रा से ठीक पहले, 'इंडियन एक्स-सर्विसमैन गोरखा ब्रिगेड नेपाल पोखरा' ने एक विशाल विरोध-प्रदर्शन आयोजित किया। प्रदर्शनकारियों ने जिला प्रशासन कार्यालय के माध्यम से अपनी सरकार को दो-सूत्रीय ज्ञापन सौंपा है। उनकी मुख्य मांग है कि अग्निपथ योजना के तहत नेपाली युवाओं की रुकी हुई भर्ती को तत्काल प्रभाव से फिर से शुरू किया जाए।

'50 डिग्री की गर्मी वाली खाड़ी की नौकरी से बेहतर है अग्निवीर'

प्रदर्शनकारियों का तर्क बहुत व्यावहारिक और आर्थिक है। उनके ज्ञापन के अनुसार, गल्फ देशों में 50 डिग्री के तपते तापमान में न्यूनतम वेतन पर काम करने से कहीं बेहतर भारतीय सेना की नौकरी है। उन्होंने बताया कि अग्निवीर के रूप में 4 साल के कार्यकाल में एक युवा लगभग 45 से 50 लाख रुपये तक कमा सकता है, साथ ही उसे कई अन्य सुविधाएं भी मिलती हैं। उनके लिए यह केवल एक नौकरी नहीं, बल्कि सम्मान और आर्थिक सुरक्षा का सवाल है।

भर्ती रुकने का असली कारण नेपाल सरकार

नेपाली गोरखाओं की भारतीय सेना में भर्ती का इतिहास सुगौली संधि के बाद से लगभग 207 साल पुराना है। हालांकि, साल 2020 में कोविड-19 महामारी के कारण यह भर्ती प्रक्रिया रुक गई थी। बाद में जब भारत ने 2022 में 'अग्निपथ योजना' पेश की, तो नेपाल सरकार ने इस पर रोक लगा दी। नेपाल सरकार का तर्क है कि 4 साल की अल्पकालिक सेवा के बाद युवाओं का भविष्य अनिश्चित होगा।

दूसरी ओर, भारत के पूर्व CDS जनरल अनिल चौहान ने स्पष्ट कर दिया था कि अब फैसला काठमांडू को करना है, क्योंकि भारतीय और नेपाली नागरिकों के लिए अलग-अलग भर्ती नियम नहीं हो सकते।

207 सालों की परंपरा पर मंडराता खतरा

गोरखा ब्रिगेड के अध्यक्ष कर्नल कृष्ण बहादुर खत्री का कहना है कि भर्ती बंद होने से न केवल नेपाली युवाओं के रोजगार के अवसर छिन रहे हैं, बल्कि गोरखा सैनिकों की पीढ़ियों से चली आ रही गौरवशाली परंपरा भी खतरे में है। 1947 के त्रिपक्षीय समझौते के बाद से गोरखा रेजिमेंट भारतीय सेना का अभिन्न हिस्सा रही हैं, लेकिन अब यह ऐतिहासिक रिश्ता राजनीतिक और नीतिगत फैसलों के बीच फंसा हुआ है।

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सेना प्रमुख के दौरे पर टिकी नजरें

दिलचस्प बात यह है कि यह प्रदर्शन ऐसे समय में हो रहा है जब भारतीय सेना प्रमुख जनरल धीरज सेठ 16 अगस्त से पांच दिवसीय नेपाल दौरे पर जा रहे हैं। इस यात्रा के दौरान उन्हें 'नेपाली सेना के जनरल' की मानद उपाधि से सम्मानित किया जाएगा। माना जा रहा है कि इस दौरे के दौरान गोरखा भर्ती का मुद्दा चर्चा का मुख्य केंद्र रह सकता है। अब देखना यह है कि क्या नेपाल सरकार अपने युवाओं की पुकार सुनकर इस पुरानी परंपरा को फिर से हरी झंडी देती है या नहीं।

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