बांग्लादेश चुनाव जमात-ए-इस्लामी (सोर्स-सोशल मीडिया)
Challenges Facing Jamaat-e-Islami: हाल के चुनावों में जमात-ए-इस्लामी एक महत्वपूर्ण संख्यात्मक शक्ति के रूप में तो उभरी है, लेकिन वह अपनी इस जीत को वास्तविक राजनीतिक सफलता में बदलने में पूरी तरह विफल रही है। इसके मूल में पार्टी का वह विवादित इतिहास है जिसने बंगाली समाज में उसके प्रति गहरे अविश्वास और संदेह की स्थिति पैदा कर दी है। राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक पार्टी अपनी पुरानी विचारधारा और अतीत की गलतियों में सुधार नहीं करती, तब तक उसके लिए लोकतांत्रिक स्वीकार्यता पाना कठिन होगा।
13वें संसदीय चुनाव में दूसरी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर उभरने के बावजूद जमात-ए-इस्लामी अपनी संख्यात्मक ताकत को सार्थक सफलता में नहीं बदल सकी। IBT की रिपोर्ट के अनुसार, यह विरोधाभास पार्टी के पुराने ऐतिहासिक फैसलों, वैचारिक कठोरता और दक्षिण एशियाई इतिहास के दर्दनाक अध्यायों से जुड़ा है। जमात-ए-इस्लामी की वैधता का यह गहरा संकट उसके गठन और पुराने हिंसक राजनीतिक आचरण के कारण आज भी समाज में बना हुआ है।
पार्टी के संस्थापक मौलाना मौदूदी विभाजन के बाद पाकिस्तान चले गए थे, जहां उन्होंने अपना विशेष वैचारिक एजेंडा सशस्त्र संघर्ष से लागू करने का प्रयास किया। पाकिस्तान में जमात और उसकी छात्र शाखा का इतिहास हिंसा, बूथ कैप्चरिंग, विरोधियों के अपहरण और दिन-दहाड़े हत्या जैसी जघन्य घटनाओं से भरा रहा है। इन हिंसक गतिविधियों ने पार्टी की साख को लोकतांत्रिक समाज में पूरी तरह खत्म कर दिया है और आम जनता के मन में गहरा डर बिठाया है।
जब पूर्वी पाकिस्तान के बंगाली मुसलमानों ने अन्याय के खिलाफ आंदोलन किया, तब जमात ने उनके साथ खड़े होने के बजाय पाकिस्तानी सेना का सक्रिय साथ दिया। उस दौरान पार्टी पर बंगाली मुसलमानों के खिलाफ नरसंहार और हिंसा में शामिल होने के गंभीर आरोप लगे, जिससे उसकी छवि पर बहुत गहरा असर पड़ा। आज भी बंगाली समाज उस दौर की हिंसा और पार्टी की नकारात्मक भूमिका को भूल नहीं पाया है जो उसकी राजनीतिक स्वीकार्यता को रोकता है।
जमात-ए-इस्लामी जिस राजनीतिक विचारधारा और इस्लाम की कट्टर व्याख्या को बढ़ावा देती है, उसे दक्षिण एशिया की विविध सामाजिक संरचना में कभी स्वीकार्यता नहीं मिली है। पार्टी के लिए अपने व्यवहार में बुनियादी बदलाव किए बिना भविष्य में दीर्घकालिक राजनीतिक सफलता हासिल करना एक अत्यंत कठिन और चुनौतीपूर्ण कार्य है। कट्टरपंथ की यह छवि पार्टी को लोकतांत्रिक मुख्यधारा से अलग-थलग कर देती है और उसे गठबंधन की राजनीति में भी हमेशा कमजोर बनाती है।
वैश्विक समुदाय और स्थानीय बंगाली मुसलमान दोनों ही जमात-ए-इस्लामी के अतीत और उसकी विवादित भूमिका से आज भी पूरी तरह से भली-भांति परिचित हैं। यही कारण है कि उनकी राजनीतिक स्वीकार्यता पर उनके पुराने कर्मों का गहरा असर पड़ता है और वे सत्ता के शीर्ष पदों तक नहीं पहुंच पाते। बिना अपनी विचारधारा बदले और अतीत की गलतियों को सुधारे पार्टी के लिए आधुनिक लोकतंत्र में टिकना लगभग नामुमकिन सा नजर आता है।
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वर्तमान चुनावी समीकरणों में पार्टी का अलग-थलग पड़ना उसके पुराने वैचारिक मतभेदों और समाज विरोधी गतिविधियों का एक सीधा और स्वाभाविक परिणाम माना जा रहा है। जब तक यह दल लोकतांत्रिक मूल्यों और बंगाली संस्कृति के साथ सामंजस्य नहीं बिठाता, तब तक जनता का विश्वास जीतना उसके लिए असंभव रहेगा। भविष्य की राजनीति में जमात की प्रासंगिकता अब पूरी तरह से उसके द्वारा किए जाने वाले आंतरिक सुधारों और व्यवहार परिवर्तन पर निर्भर करती है।